अंडरवर्ल्ड की नई रणनीति: दूसरे राज्यों से बुलाओ शूटर, वारदात कराओ और गायब हो जाओ

अंडरवर्ल्ड की नई रणनीति: दूसरे राज्यों से बुलाओ शूटर, वारदात कराओ और गायब हो जाओ

जुर्म और अंडरवर्ल्ड की काली गलियों में खूनी टकराव का पुराना ढर्रा अब पूरी तरह ध्वस्त हो चुका है। पहले जहां किसी आपराधिक गिरोह की पहचान उसके वफादार गुर्गों और साथ चलने वाले हथियारबंद शूटरों की जमात से होती थी, वहीं अब इस तौर-तरीके में एक खतरनाक मोड़ आ चुका है।

बदलते दौर में गैंगवार और सुपारी किलिंग का ढांचा कॉरपोरेट जगत की तरह 'आउटसोर्स' होने लगा है। आधुनिक गिरोह अब स्थायी शूटर पालने के झंझट से बच रहे हैं और तय रकम के बदले दूसरे शहरों या गैर-राज्यों से किराए के हमलावरों को बुलाकर संगीन वारदातों को अंजाम दिलवा रहे हैं। इस नए चलन ने गिरोह, सरगना और पूरे सिंडिकेट की पारंपरिक परिभाषा को ही पूरी तरह बदलकर रख दिया है।

पारंपरिक सिंडिकेट का खात्मा: पुलिस की रडार से बचने की शातिर चाल

पुराने दौर में जब भी कोई गैंगवार, वसूली या रंजिश का मामला सामने आता था, तो गिरोह का सरगना अपने खास आदमियों को ही हमले का जिम्मा सौंपता था। पुलिस के लिए भी ऐसे मामलों में गिरोह की पहचान करना, स्थानीय नेटवर्क को ट्रेस करना और संलिप्त चेहरों तक पहुंचना काफी हद तक आसान रहता था। अपराधियों ने अब कानून के इसी शिकंजे से बचने के लिए एक सोची-समझी दूरी बना ली है। गिरोहों में अब सदस्यों की कमी भी देखी जा रही है, जिस वजह से सरगना अपने स्तर पर भीड़ जुटाने के बजाय प्रोफेशनल हत्यारों को हायर करने की रणनीति पर काम कर रहे हैं।

सुपारी मास्टरमाइंड कहीं और, गोली चलाने वाले दूसरे राज्य के

मौजूदा मॉडस ऑपरेंडी का सबसे पेचीदा पहलू यह है कि हत्या की साजिश रचने वाला और ट्रिगर दबाने वाला एक-दूसरे से पूरी तरह अनजान रहते हैं। मास्टरमाइंड सीधे तौर पर हमलावरों के संपर्क में नहीं आता, बल्कि बिचौलियों के जरिए किसी दूसरे शहर या राज्य के पेशेवर शूटरों को तय रकम देकर हायर करता है। शूटरों का मकसद सिर्फ पैसा लेना, वारदात को अंजाम देना और तुरंत भाग निकलना होता है।

हाल ही में हुए चर्चित निखार सबलोक हत्याकांड की तफ्तीश में भी जांच एजेंसियों के सामने ठीक यही पैटर्न खुलकर सामने आया है। पुलिस जांच में यह साफ हुआ है कि कत्ल की सुपारी देकर बाहर के राज्य से शूटर मंगवाए गए थे। इसी खुलासे के बाद अब पुलिस सिर्फ स्थानीय बदमाशों की कुंडली नहीं खंगाल रही, बल्कि अंतरराज्यीय शूटर सिंडिकेट और हथियार व शूटर मुहैया कराने वाले एजेंटों के पूरे नेक्सस की जड़ें तलाश रही है।

डिजिटल नेटवर्क और मोबाइल की आड़: जांच एजेंसियों के सामने साक्ष्यों की चुनौती

इस पूरे काले कारोबार की रीढ़ मोबाइल फोन और एन्क्रिप्टेड डिजिटल प्लेटफॉर्म बन चुके हैं। अलग-अलग राज्यों में बैठे सूत्रधार इंटरनेट और डिजिटल माध्यमों से तालमेल बिठाते हैं, जिससे अपराध का दायरा किसी एक जिले या राज्य तक सीमित नहीं रह जाता।

वारदात होते ही बाहरी शूटर अपने गृह राज्य या किसी महफूज ठिकाने पर निकल जाते हैं, जबकि स्थानीय साजिशकर्ता वहीं रहकर माहौल को भांपते हैं। ऐसे में पुलिस के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह साबित करने की होती है कि स्थानीय सुपारी देने वाले, डील कराने वाले दलाल और बाहरी शूटर के बीच क्या कड़ी थी।

प्रत्यक्ष गवाहों के अभाव में अब खाकी को इलेक्ट्रॉनिक सर्विलांस, डिजिटल ट्रेल और ऑनलाइन मनी ट्रांजैक्शन जैसे तकनीकी और वित्तीय सुबूतों पर पूरी तरह निर्भर रहना पड़ रहा है। साफ है कि अब सरगना का दबदबा उसके साथ घूमने वाले गुर्गों की तादाद से नहीं, बल्कि अलग-अलग राज्यों के अपराधियों को एक नेटवर्क में पिरोने की डिजिटल ताकत से तय हो रहा है।