भगवान जगन्नाथ रथयात्रा : धर्म एवं आस्था का विराट वैभव

भारत उत्सवों का देश है। यहां पर वर्ष भर नाना प्रकार के उत्सव होते रहते हैं। इन धार्मिक उत्सवों में विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ रथयात्रा सबसे प्रमुख है। यह रथयात्रा न केवल भारत अपितु विदेशों से आने वाले पर्यटकों के लिए भी आकर्षण का केंद्र होती है। बंगाल की खाड़ी में सागर तट पर बसे पुरी शहर में होने वाली जगन्नाथ रथयात्रा उत्सव के समय धर्म एवं आस्था के विराट वैभव का दर्शन होता है। रथयात्रा के दौरान भक्तों को सीधे प्रतिमाओं तक पहुंचना बहुत शुभ माना जाता है।

विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ रथयात्रा का दस दिवसीय महोत्सव होता है। यात्रा की तैयारी अक्षय तृतीया के दिन श्रीकृष्ण, बलराम और सुभद्रा के रथों के निर्माण के साथ ही प्रारंभ हो जाती है। हर वर्ष देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु इस महापर्व के साक्षी बनने पुरी पहुँचते हैं। पुरी भारत के चार पवित्र धामों में से एक प्रमुख धाम है। यहां का मुख्य मंदिर 800 वर्ष पुराना है, जिसमे योगेश्वर श्रीकृष्ण जगन्नाथ के रूप में विराजते हैं।मंदिर में बलभद्र एवं सुभद्रा भी विराजमान हैं।

सनातन परंपरा में परिवर्तन होते रहते हैं। जगन्नाथ रथयात्रा महोत्सव में भी समय के साथ कुछ परिवर्तन हुए हैं। वर्तमान समय में रथयात्रा में जगन्नाथ को दशावतारों के रूप में पूजा जाता है। इसमें विष्णु, कृष्ण, वामन और बुद्ध आदि अवतार शामिल हैं। इसी तरह विगत कुछ दशकों से देश के कई हिस्सों में पुरी की तर्ज पर जगन्नाथ रथयात्रा का आयोजन होने लगा है।

रथ का रूप भक्ति एवं श्रद्धा के रस से परिपूर्ण होता है, जिसके गतिमान होने पर शब्दों की ध्वनि निकलती है। रथ में धूप और अगरबत्ती की सुगंध होती है और इसे भक्तों का पवित्र स्पर्श प्राप्त होता है। शास्त्रों के अनुसार रथ का निर्माण बुद्धि, चित्त और अहंकार से होता है, इसमें आत्मा रूपी भगवान जगन्नाथ विराजमान होते हैं।

भगवान गन्नाथ के मंदिर में पूजा, आचार-व्यवहार, रीति-नीति समेत समग्र व्यवस्थाएं शैव, वैष्णव, बौद्ध, जैन मतों का समिश्रण है। इस प्रकार यह रथयात्रा शरीर और आत्मा के मेल का संकेत है और आत्मदृष्टि बनाए रखने की प्रेरणा देती है। रथयात्रा के समय रथ का संचालन आत्मा युक्त शरीर करता है जो जीवन यात्रा का प्रतीक है। जिस तरह से शरीर में आत्मा होते हुए भी वह माया द्वारा संचालित होती है, उसी प्रकार भगवान जगन्नाथ के विराजमान होने पर भी रथ को खींचने के लिए लोक-शक्ति की आवश्यकता होती है। इस तरह जगन्नाथ रथयात्रा लोक-शक्ति की प्रतिष्ठा का भी द्योतक है।

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