मखाना के बाद अब मरुआ (रागी) से बदलेगी मिथिलांचल के किसानों की तकदीर और कृषि बाजार में आएगा नया भूचाल

मखाना के बाद अब मरुआ (रागी) से बदलेगी मिथिलांचल के किसानों की तकदीर और कृषि बाजार में आएगा नया भूचाल

बिहार के मिथिलांचल क्षेत्र में जल-जीवन और कृषि संस्कृति का नाम आते ही सबसे पहले मखाना और मछली का ख्याल दिमाग में आता है। लेकिन अब इस पावन और उपजाऊ भूमि पर एक ऐसा पारंपरिक अनाज फिर से सिर उठाकर खड़ा हो रहा है, जो कभी विलुप्त होने की कगार पर पहुँच चुका था। जी हां, हम बात कर रहे हैं पौष्टिकता से भरपूर मरुआ (रागी/मडुआ) की, जिसकी खेती मिथिलांचल के खेतों में एक बार फिर से बेहद शान और नए तकनीकी अंदाज के साथ लौट आई है। मखाना की वैश्विक सफलता और जीआई टैग (GI Tag) मिलने के बाद अब बिहार सरकार और कृषि वैज्ञानिकों ने मिथिलांचल के किसानों की आर्थिक स्थिति को नई ऊंचाइयों पर ले जाने के लिए मरुआ उत्पादन को बढ़ावा देने का महाअभियान शुरू कर दिया है। स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती वैश्विक जागरूकता के इस दौर में मरुआ को सुपरफूड (Superfood) के रूप में देखा जा रहा है, जिससे किसान भाई बेहद कम लागत में कई गुना अधिक मुनाफा कमाकर अपनी किस्मत बदल सकते हैं।

मरुआ की खेती में क्यों लौट रही है मिथिलांचल के किसानों की दिलचस्पी और क्या हैं इसके मुख्य कारण

बीते कुछ दशकों में आधुनिक फसलों की अंधी दौड़ और बदलती जीवनशैली के चलते मिथिलांचल के पारंपरिक मोटे अनाजों (Millets) की खेती काफी हद तक पिछड़ गई थी। लेकिन अंतरराष्ट्रीय मिलेट्स वर्ष और केंद्र व राज्य सरकार की प्रोत्साहन योजनाओं के बाद ग्रामीण इलाकों के किसानों का ध्यान फिर से इस पारंपरिक फसल की ओर आकर्षित हुआ है। मरुआ की खेती की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह अत्यंत कम पानी और बेहद सामान्य उपजाऊ जमीन पर भी बंपर पैदावार देने की क्षमता रखती है। बाढ़ या सुखाड़ जैसी प्रतिकूल प्राकृतिक आपदाओं को झेलने में सक्षम होने के कारण मिथिलांचल के छोटे और सीमांत किसानों के लिए यह फसल एक मजबूत सुरक्षा कवच साबित हो रही है। मौसम की मार के बावजूद इसकी फसल खराब नहीं होती, जिससे किसानों को किसी भी सूरत में आर्थिक नुकसान का सामना नहीं करना पड़ता है।

स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता, मिलेट्स की अंतरराष्ट्रीय मांग और प्रोसेस्ड प्रोडक्ट्स से बंपर कमाई

आजकल केवल भारत ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में लोग डायबिटीज (मधुमेह), मोटापा, ब्लड प्रेशर और दिल से जुड़ी बीमारियों से बचाव के लिए जैविक और पौष्टिक अनाज की ओर तेजी से रुख कर रहे हैं। मरुआ में कैल्शियम, प्रोटीन, आयरन, फाइबर और एंटी-ऑक्सीडेंट्स का विशाल भंडार पाया जाता है, जिसके कारण बाजार में इसकी मांग दिन-प्रतिदिन आसमान छू रही है। केवल कच्चे मरुआ अनाज को बेचने के बजाय किसान और स्थानीय महिला स्वयं सहायता समूह (Self Help Groups) अब इसके मूल्य संवर्धन यानी वैल्यू एडिशन (Value Addition) पर विशेष ध्यान दे रहे हैं। मरुआ के आटे से बिस्कुट, कुकीज, नूडल्स, दलिया, लड्डू और बेकरी आइटम्स बनाकर पैकेज्ड रूप में राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय बाजारों में सप्लाई किया जा रहा है। इस प्रोसेसिंग तकनीक के जुड़ने से किसानों को मरुआ की उपज का सामान्य भाव से तीन से चार गुना तक अधिक दाम मिल रहा है।

राज्य सरकार की विशेष प्रोत्साहन योजनाएं, सब्सिडी और कृषि वैज्ञानिकों के आधुनिक गुर

बिहार के कृषि विभाग ने मिथिलांचल के दरभंगा, मधुबनी, समस्तीपुर, सहरसा और आसपास के जिलों में मरुआ की खेती को व्यावसायिक रूप देने के लिए विशेष क्लस्टर योजनाएं शुरू की हैं। किसानों को प्रमाणित और उन्नत किस्म के मरुआ बीज (High-Yielding Varieties) पूरी तरह से मुफ्त या भारी सब्सिडी (Subsidies) पर उपलब्ध कराए जा रहे हैं। इसके साथ ही कृषि विज्ञान केंद्रों (KVK) के विशेषज्ञ गांव-गांव जाकर किसानों को कम लागत में जैविक तरीके से बीज उपचार, सही समय पर बुवाई और फसल सुरक्षा के आधुनिक गुर सिखा रहे हैं। सरकार द्वारा मरुआ की सरकारी खरीद के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की व्यवस्था को भी पारदर्शी बनाया जा रहा है, जिससे किसानों को व्यापारियों या बिचौलियों के हाथों औने-पौने दामों में अपनी फसल बेचने को मजबूर न होना पड़े।

मखाना और मरुआ की दोहरी ताकत से मिथिलांचल बनेगा बिहार का नया एग्रो-प्रोसेसिंग हब

मखाना ने जिस तरह से पूरे विश्व में मिथिलांचल का डंका बजाया है, ठीक उसी राह पर अब मरुआ भी अपनी छाप छोड़ने के लिए पूरी तरह से तैयार है। विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि अगर मरुआ की खेती, ब्रांडिंग और पैकेजिंग को इसी तरह व्यवस्थित ढंग से आगे बढ़ाया गया, तो आने वाले कुछ ही सालों में मिथिलांचल देश का सबसे बड़ा 'मिलेट्स और एग्रो-प्रोसेसिंग हब' बनकर उभरेगा। इससे न केवल स्थानीय किसानों और युवाओं की आय में अभूतपूर्व बढ़ोतरी होगी, बल्कि गांवों से होने वाले पलायन पर भी बहुत हद तक लगाम लग सकेगी। मरुआ की यह हरी-भरी फसलें अब मिथिलांचल की धरती पर समृद्धि, आत्मनिर्भरता और एक नए सुनहरे दौर की नई दास्तान लिख रही हैं।