बैंकों से कर्ज लेना महंगा हुआ तो कंपनियों ने खोज लिया नया जुगाड़, बचा रहीं करोड़ों का ब्याज

बैंकों से कर्ज लेना महंगा हुआ तो कंपनियों ने खोज लिया नया जुगाड़, बचा रहीं करोड़ों का ब्याज

देश और दुनिया भर में बढ़ती महंगाई को नियंत्रित करने के लिए केंद्रीय बैंकों द्वारा ब्याज दरों में की गई बढ़ोतरी के बाद भारतीय कॉर्पोरेट जगत के सामने बड़ा संकट खड़ा हो गया था। वाणिज्यिक बैंकों (Commercial Banks) से लोन लेना अत्यधिक महंगा होने के बाद भारतीय कंपनियों और कॉर्पोरेट घरानों ने पैसों का इंतजाम करने का एक नया, स्मार्ट और किफायती जुगाड़ ढूंढ निकाला है। बैंकों की चौखट पर भारी-भरकम ब्याज चुकाने के बजाय अब दिग्गज कंपनियां सीधे पूंजी बाजार (Capital Market) का रुख कर रही हैं और 'कॉर्पोरेट बॉन्ड्स' (Corporate Bonds) तथा 'कमर्शियल पेपर्स' (Commercial Papers - CPs) जारी करके हजारों करोड़ों रुपये जुटा रही हैं। इस मास्टरस्ट्रोक के जरिए कंपनियां न केवल बैंकों के कड़े नियमों और कागजी झंझटों से बच रही हैं, बल्कि हर साल करोड़ों रुपये के ब्याज भुगतान की भी सीधी बचत कर रही हैं। वित्तीय विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय कंपनियों का यह नया पैंतरा देश के डेट मार्केट (Debt Market) की तस्वीर को हमेशा के लिए बदलने जा रहा है।

महंगे बैंक लोन से क्यों बिगड़ा कंपनियों का गणित और कैसे मिला नया रास्ता?

पिछले कुछ समय में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) द्वारा रेपो रेट में की गई बढ़ोतरी के कारण बैंकों ने अपने लेंडिंग रेट्स (MCLR और EBLR) में जोरदार इजाफा कर दिया था। इसके चलते बड़े उद्योगों और कंपनियों के लिए वर्किंग कैपिटल (Working Capital) तथा बिजनेस विस्तार के लिए बैंकों से कर्ज लेना बेहद खर्चीला सौदा साबित होने लगा था। बैंकों से लोन लेने पर कंपनियों को 9 से 11 प्रतिशत तक का भारी ब्याज चुकाना पड़ रहा था, जिससे उनके मुनाफे पर सीधा असर पड़ रहा था। इस वित्तीय दबाव से निकलने के लिए कंपनियों के चीफ फाइनेंशियल ऑफिसर्स (CFOs) ने रणनीति बदली और लोन के पारंपरिक रास्ते को छोड़कर बॉन्ड मार्केट से फंड जुटाना शुरू किया। बॉन्ड मार्केट में मजबूत क्रेडिट रेटिंग (AAA या AA+) वाली कंपनियों को 7.5 से 8.5 प्रतिशत की दर से ही लोन उपलब्ध हो रहा है, जिससे उन्हें सीधे तौर पर 1.5 से 2 प्रतिशत तक के ब्याज की बचत हो रही है।

क्या होते हैं कॉर्पोरेट बॉन्ड्स और कमर्शियल पेपर्स जिनसे बन रहा है बड़ा काम?

आम भाषा में समझें तो जब किसी कंपनी को लंबी अवधि (1 से 10 साल) के लिए पैसों की जरूरत होती है, तो वह बैंकों के पास जाने के बजाय बाजार में अपने 'कॉर्पोरेट बॉन्ड्स' जारी करती है। इसमें म्यूचुअल फंड्स, बीमा कंपनियां, पेंशन फंड्स और बड़े निवेशक सीधे कंपनी को पैसा उधार देते हैं। वहीं दूसरी तरफ, शॉर्ट-टर्म यानी कम अवधि (जैसे 7 दिन से 1 साल) की नकदी जरूरतों को पूरा करने के लिए कंपनियां 'कमर्शियल पेपर्स' (CPs) जारी करती हैं। ये अनसिक्योर्ड मनी मार्केट इंस्ट्रूमेंट्स होते हैं जिन्हें कंपनियां अपनी साख के दम पर जारी करती हैं। चूंकि इसमें बैंक बीच का बिचौलिया नहीं होता और क्रेडिट जोखिम कम होता है, इसलिए निवेशकों को भी बैंकों में एफडी (FD) कराने की तुलना में बेहतर रिटर्न मिल जाता है और कंपनी को भी सस्ता फंड मिल जाता है।

म्यूचुअल फंड्स और पेंशन फंड्स बन रहे कंपनियों के सबसे बड़े मददगार

कंपनियों के इस नए 'जुगाड़' को सफल बनाने में देश के डेट म्यूचुअल फंड्स (Debt Mutual Funds), पेंशन फंड्स और लाइफ इंश्योरेंस कंपनियों (जैसे LIC) की सबसे बड़ी भूमिका रही है। इन संस्थागत निवेशकों (Institutional Investors) के पास भारी मात्रा में सरप्लस कैश मौजूद होता है, जिसे वे सुरक्षित और बेहतर रिटर्न वाली जगह निवेश करना चाहते हैं। जब देश की बड़ी और भरोसेमंद कंपनियां अपने बॉन्ड्स बाजार में लाती हैं, तो ये फंड हाउसेज तुरंत उनमें हजारों करोड़ रुपये निवेश कर देते हैं। इस व्यवस्था से 'विन-विन' की स्थिति बन गई है—निवेशकों को एफडी से ज्यादा ब्याज मिल जाता है और कंपनियों को बैंक रेट से काफी कम दर पर कर्ज मिल जाता है। इस ट्रेंड के कारण भारत के डोमेस्टिक बॉन्ड मार्केट में ट्रेडिंग वॉल्यूम रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है।

बैंक क्रेडिट ग्रोथ पर असर: क्या दबाव में आकर ब्याज दरें घटाएंगे बैंक?

भारतीय कंपनियों के इस अप्रत्याशित कदम ने देश के बड़े-बड़े सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के बैंकों के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं। बैंक अब तक अपने बड़े कॉर्पोरेट क्लाइंट्स को भारी-भरकम लोन देकर तगड़ा मुनाफा कमाते थे, लेकिन अब जब देश की 'ब्लूचिप' कंपनियां बैंकों से किनारा कर सीधे बॉन्ड मार्केट का रुख कर रही हैं, तो बैंकों की क्रेडिट ग्रोथ (Credit Growth) सुस्त पड़ने लगी है। अपने सबसे बड़े और सुरक्षित ग्राहकों को रिटेन करने के लिए अब कई बैंकों ने अपनी रणनीतियों में बदलाव करना शुरू कर दिया है। बैंक अब अपनी ब्याज दरों में लचीलापन ला रहे हैं और विशेष 'कॉर्पोरेट डिस्काउंट' की पेशकश कर रहे हैं ताकि कंपनियां दोबारा उनके पास लोन लेने आएं। हालांकि, कंपनियां अभी भी बॉन्ड मार्केट को ज्यादा पारदर्शी और किफायती मान रही हैं।

भारतीय अर्थव्यवस्था और कॉर्पोरेट सेक्टर के लिए इस बड़े बदलाव के दूरगामी मायने

कंपनियों द्वारा महंगे बैंक लोन का विकल्प ढूंढना केवल एक अल्पकालिक जुगाड़ नहीं है, बल्कि यह भारतीय वित्तीय तंत्र के परिपक्व होने की दिशा में एक बहुत बड़ा और ऐतिहासिक कदम है। दुनिया की विकसित अर्थव्यवस्थाओं (जैसे अमेरिका और यूरोप) में कंपनियां अपने बिजनेस के लिए बैंकों पर निर्भर रहने के बजाय 70 से 80 प्रतिशत फंड्स बॉन्ड मार्केट से ही जुटाती हैं। भारत में भी अब यह संस्कृति तेजी से विकसित हो रही है। ब्याज में करोड़ों रुपये की बचत होने से कंपनियों का नेट प्रॉफिट (Net Profit) बढ़ेगा, जिससे वे अनुसंधान, नए प्लांट लगाने और रोजगार सृजन में पैसा खर्च कर सकेंगी। अंततः, सस्ता फंड मिलने से भारत की औद्योगिक उत्पादन क्षमता को नई रफ्तार मिलेगी जो देश को 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने के सपने को और मजबूती प्रदान करेगी।