यूक्रेन में स्टारलिंक के इस्तेमाल का डर क्या भारत के लिए है बड़ा खतरा

यूक्रेन में स्टारलिंक के इस्तेमाल का डर क्या भारत के लिए है बड़ा खतरा

आधुनिक युद्ध और सामरिक रणनीतियों का स्वरूप पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बदल चुका है। अब युद्ध केवल सरहद पर तोपों और टैंकों से नहीं लड़े जाते, बल्कि अंतरिक्ष में घूमते उपग्रहों, सैटेलाइट इंटरनेट और साइबर स्पेस के जरिए भी राष्ट्रों की संप्रभुता को चुनौती दी जाती है। रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे लंबे युद्ध के दौरान एलन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स (SpaceX) के सैटेलाइट इंटरनेट नेटवर्क 'स्टारलिंक' (Starlink) के सैन्य उपयोग और उसके संभावित दुरुपयोग को लेकर दुनिया भर के रक्षा विशेषज्ञ लगातार चिंता जता रहे हैं। इसी वैश्विक परिप्रेक्ष्य को आधार बनाते हुए भारत में भी राजनीतिक और सामरिक हलकों में आवाजें उठने लगी हैं। हाल ही में शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) की वरिष्ठ सांसद और संसद प्रियंका चतुर्वेदी ने भारत सरकार को इस मामले में गंभीर चेतावनी जारी की है। प्रियंका चतुर्वेदी ने कहा है कि यूक्रेन में स्टारलिंक को लेकर जिस प्रकार की सुरक्षा चिंताएं और नियंत्रण से बाहर होने के डर पैदा हुए हैं, वे भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक बड़ा सबक और गंभीर चेतावनी हैं, जिस पर सरकार को अभी से सतर्क हो जाना चाहिए।

यूक्रेन युद्ध में कैसे गेमचेंजर और विवादों का केंद्र बना स्टारलिंक?

जब रूस ने यूक्रेन पर आक्रमण किया था, तो शुरुआती दौर में देश का जमीनी टेलीकॉम और इंटरनेट बुनियादी ढांचा तबाह हो गया था। ऐसे संकट के समय एलन मस्क की कंपनी ने यूक्रेन को स्टारलिंक टर्मिनल उपलब्ध कराए, जिससे यूक्रेनी सेना को कम्यूनिकेशन बनाए रखने और ड्रोन हमलों को संचालित करने में अभूतपूर्व मदद मिली। इसे तकनीकी दुनिया में एक बड़ी क्रांति माना गया, लेकिन इसके साथ ही एक खतरनाक पहलू भी सामने आया। रिपोर्ट्स के अनुसार, कई बार यह भी सामने आया कि युद्ध के मैदान में गैर-पारंपरिक और अनधिकृत ताकतों या रूसी सेना द्वारा भी कथित तौर पर इन टर्मिनलों के इस्तेमाल के रास्ते तलाशे गए, जिससे स्पेसएक्स और अमेरिकी प्रशासन के नियंत्रण पर भी सवाल उठे। एक निजी अरबपति के स्वामित्व वाली अंतरिक्ष तकनीक जब किसी संप्रभु देश के युद्ध या आंतरिक मामलों में इस हद तक दखਲ देने लगे कि सरकारें भी मजबूर हो जाएं, तो यह किसी भी देश की सुरक्षा के लिए खतरे की घंटी बन जाती है।

प्रियंका चतुर्वेदी की दो टूक: भारत को अपनी अंतरिक्ष सुरक्षा को लेकर क्यों होना चाहिए गंभीर?

सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने अपने हालिया बयानों और नीतिगत बहसों में इसी बात पर जोर दिया है कि भारत जैसे विशाल और रणनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील देश को विदेशी निजी कंपनियों के भरोसे अपने संचार तंत्र को नहीं छोड़ना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि आने वाले समय में जब भारत में भी ग्लोबल सैटेलाइट ब्रॉडबैंड सेवाएं शुरू होने जा रही हैं और कई विदेशी कंपनियां बाजार में उतरने की होड़ में हैं, तो सरकार को रेगुलेटरी फ्रेमवर्क बेहद सख्त रखना होगा। यदि देश के भीतर किसी विदेशी प्राइवेट सैटेलाइट ऑपरेटर का नेटवर्क पूरी तरह से अनियंत्रित या अपारदर्शी रहता है, तो आपातकालीन परिस्थितियों या राष्ट्रीय सुरक्षा के संकट के समय देश की खुफिया जानकारी और सामरिक संप्रेषण खतरे में पड़ सकते हैं। प्रियंका चतुर्वेदी का यह बयान ऐसे समय में आया है जब भारत सरकार खुद देश के भीतर अंतरिक्ष क्षेत्र (Space Sector) को निजी निवेश के लिए खोल रही है, ताकि भारतीय कंपनियां भी इस सेक्टर में ग्लोबल लीडर बन सकें।

भारत की अंतरिक्ष नीतियां और आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ते कदम

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) और केंद्र सरकार की नीतियों पर गौर करें तो भारत हमेशा से अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के मामले में 'आत्मनिर्भरता' (Atmanirbhar Bharat) के सिद्धांत पर काम करता रहा है। भारत ने अपने स्वयं के नेविगेशन सिस्टम (NavIC) और अत्याधुनिक संचार उपग्रहों का एक मजबूत नेटवर्क तैयार किया है, ताकि हमें किसी भी विदेशी तकनीक पर पूरी तरह निर्भर न रहना पड़े। हालांकि, कमर्शियल मार्केट में ग्लोबल लो अर्थ ऑर्बिट (LEO) सैटेलाइट इंटरनेट प्रोवाइडर्स की एंट्री से प्रतिस्पर्धा जरूर बढ़ रही है। सरकार और टेलीकॉम रेगुलेटर (TRAI) इस बात को लेकर लगातार मंथन कर रहे हैं कि सुरक्षा मानकों, डेटा लोकलाइजेशन और राष्ट्रीय सुरक्षा (National Security) से जुड़े प्रावधानों का कड़ाई से पालन कराया जाए, ताकि किसी भी अप्रिय स्थिति में भारत की डिजिटल और सैटेलाइट संप्रभुता सुरक्षित बनी रहे।

राष्ट्रीय सुरक्षा से कोई समझौता नहीं: भविष्य के लिए सबक

यूक्रेन में स्टारलिंक को लेकर जो परिस्थितियां पैदा हुई हैं, वे पूरी दुनिया के नीति निर्माताओं के लिए एक बड़ा केस स्टडी बन चुकी हैं। प्रियंका चतुर्वेदी द्वारा उठाई गई यह चिंता इस बात की याद दिलाती है कि तकनीक चाहे जितनी आधुनिक और फायदेमंद हो, उसके सामरिक और भू-राजनीतिक निहितार्थों की अनदेखी करना देश की सुरक्षा को दांव पर लगाने जैसा है। भारत सरकार और सुरक्षा एजेंसियों के सामने यह एक बड़ी जिम्मेदारी है कि वे निजी अंतरिक्ष कंपनियों और विदेशी तकनीकी दिग्गजों के लिए ऐसा अचूक सुरक्षा कवच तैयार करें, जिससे देश के अंदरूनी मामलों और सैन्य संचार में किसी भी प्रकार की बाहरी सेंधमारी की गुंजाइश न बचे। आने वाले दिनों में भारत के रणनीतिक गलियारों में इस बात पर और अधिक गहराई से विचार किए जाने की पूरी संभावना है।