सहारनपुर के तैरने वाले गोबर के दीपक से जगमग होंगे PM, CM और राष्ट्रपति आवास
उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले से एक ऐसी अनूठी और प्रेरणादायक खबर सामने आई है जो देश भर में चर्चा का विषय बनी हुई है। यहां स्थित प्रसिद्ध मां शाकंभरी कान्हा उपवन गोशाला में इस बार दीपावली के पर्व के लिए विशेष प्रकार के इको-फ्रेंडली दीये तैयार किए जा रहे हैं। इन दीयों की सबसे बड़ी खूबी यह है कि ये पानी में आसानी से तैर सकते हैं और पूरी तरह से पर्यावरण के अनुकूल हैं। सहारनपुर नगर निगम की इस पहल ने न केवल स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए द्वार खोले हैं, बल्कि पारंपरिक उत्सव मनाने के तरीके में भी एक आधुनिक और सकारात्मक बदलाव की नींव रखी है। इन स्वदेशी और पर्यावरण-अनुकूल उत्पादों की ख्याति अब स्थानीय सीमाओं को पार कर देश के सर्वोच्च कार्यालयों तक पहुंच चुकी है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आवास के साथ-साथ देश के प्रधानमंत्री आवास और राष्ट्रपति भवन को भी रोशन करने के लिए सहारनपुर के इन विशेष गोबर के दीयों की मांग की गई है। यह सहारनपुर के स्थानीय कारीगरों और गोशाला से जुड़े स्वयं सहायता समूहों के लिए एक बहुत बड़ी उपलब्धि है जो मेक इन इंडिया और वोकल फॉर लोकल के सपने को जमीन पर उतार रही है।
पानी में तैरने वाले इन अनोखे दीयों की क्या है खासियत और कैसे बनते हैं ये
पारंपरिक रूप से दीये मिट्टी के बनाए जाते रहे हैं लेकिन बदलते समय के साथ अब गोबर से बने गोमय उत्पादों का चलन तेजी से बढ़ रहा है। सहारनपुर की कान्हा उपवन गोशाला में तैयार होने वाले इन दीयों को बनाने की प्रक्रिया पूरी तरह से वैज्ञानिक और प्राकृतिक है। इन्हें बनाने के लिए गाय के शुद्ध गोबर और गोमूत्र के साथ-साथ मुल्तानी मिट्टी, चूना, मैदा, लकड़ी का पाउडर और विशेष रूप से तुलसी के बीजों का मिश्रण तैयार किया जाता है। इन सभी सामग्रियों को एक तय अनुपात में मिलाकर सांचों में ढाला जाता है जिससे मजबूत और सुंदर दीये तैयार होते हैं। पानी में तैरने की खूबी इन दीयों को बाकी उत्पादों से पूरी तरह अलग बनाती है। लोग इन्हें स्विमिंग पूल, पानी से भरे बड़े बर्तनों, फाउंटेन या गार्डन के वाटर बॉडीज में आसानी से तैरा सकते हैं। इसके अलावा इन दीयों के अंदर तुलसी के बीज डाले गए हैं जिनका सबसे बड़ा फायदा यह है कि जब दीये का उपयोग समाप्त हो जाता है और इन्हें गमले या मिट्टी में डाला जाता है, तो इनमें से तुलसी के पौधे उग जाते हैं। यह जीरो वेस्ट और इको-फ्रेंडली कॉन्सेप्ट आज के समय में पर्यावरण प्रेमियों को बहुत आकर्षित कर रहा है।
प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और राष्ट्रपति आवास तक कैसे पहुंची इन दीयों की गूंज
एक छोटे से शहर से शुरू हुआ यह नवाचार आज देश के सर्वोच्च सत्ता केंद्रों तक पहुंच गया है, जिसके पीछे इसकी उच्च गुणवत्ता और अनूठी परिकल्पना है। जब देश के प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री पर्यावरण संरक्षण और स्वदेशी उत्पादों को बढ़ावा देने की लगातार अपील करते हैं, ऐसे में सहारनपुर के इन गोबर के दीयों ने राष्ट्रीय स्तर पर नीति निर्माताओं का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। जिला प्रशासन और नगर निगम के प्रयासों से तैयार किए गए इन दीयों के सैंपल जब देश के बड़े अधिकारियों और विशिष्ट कार्यालयों तक पहुंचे, तो उनकी कारीगरी और पर्यावरण के प्रति प्रतिबद्धता को देखकर इसकी सराहना की गई। राष्ट्रपति भवन, प्रधानमंत्री आवास और मुख्यमंत्री आवास में इस बार दीवाली के मौके पर इन्हीं तैरने वाले गोबर के दीयों से रोशनी बिखेरने की तैयारी चल रही है। यह सहारनपुर के लिए ही नहीं बल्कि पूरे उत्तर प्रदेश के लिए गर्व का क्षण है। इस पहल से न केवल गोवंश के संरक्षण को बढ़ावा मिल रहा है बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था और स्थानीय कारीगरों की कला को राष्ट्रीय मंच पर एक नई पहचान भी मिल रही है।
पर्यावरण संरक्षण और ग्रामीण आर्थिकी को मिल रहा है मजबूत संबल
दीपावली का त्योहार रोशनी और खुशियों का प्रतीक है लेकिन पिछले कुछ वर्षों में चीनी सामानों और प्लास्टिक आधारित डेकोरेशन ने पर्यावरण के सामने गंभीर चुनौतियां खड़ी कर दी थीं। ऐसे समय में सहारनपुर के इन गोबर के दीयों ने एक शानदार और टिकाऊ विकल्प पेश किया है। गोशालाओं में इस तरह के उत्पादों के बनने से गोबर का सदुपयोग सुनिश्चित हो रहा है और गोवंश के रखरखाव में आने वाली लागत को कम करने में भी मदद मिल रही है। गोशाला से जुड़ी महिलाओं और स्थानीय कारीगरों को इस कार्य से निरंतर रोजगार मिल रहा है, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत हो रही है। लोग अब भारी मात्रा में इन दीयों की एडवांस बुकिंग कर रहे हैं ताकि वे भी अपने घरों में पर्यावरण अनुकूल दीवाली मना सकें। सहारनपुर का यह मॉडल अब देश के दूसरे जिलों के लिए भी एक मिसाल बन गया है कि किस तरह पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक सोच को मिलाकर आत्मनिर्भर भारत की दिशा में ठोस कदम उठाए जा सकते हैं। आने वाले दिनों में इस तरह के गोमय उत्पादों की मांग देश और दुनिया के अन्य कोनों में भी और अधिक बढ़ने की पूरी संभावना है।