क्‍वाड इज बैक... अमेरिका को समझ आ गई भारत की अहमियत, चीन-पाक के लिए इशारा हैं मार्को रूबियो की ये बातें

क्‍वाड इज बैक... अमेरिका को समझ आ गई भारत की अहमियत, चीन-पाक के लिए इशारा हैं मार्को रूबियो की ये बातें

अंतरराष्ट्रीय राजनीति और भू-राजनीतिक समीकरणों के बदलते दौर में एक बार फिर इस बात पर मुहर लग गई है कि वैश्विक शांति और एशिया-प्रशांत क्षेत्र में सुरक्षा संतुलन बनाए रखने के लिए भारत की भूमिका कितनी अहम और अपरिहार्य है। अमेरिका के शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व और विदेश नीति के मोर्चे पर बेहद प्रभावशाली माने जाने वाले नेता मार्को रूबियो के हालिया बयानों और कदमों ने वैश्विक कूटनीति के गलियारों में हलचल मचा दी है। एक समय पर जिस 'क्वाड' (Quad) यानी भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के रणनीतिक समूह को लेकर कई तरह की अटकलें लगाई जा रही थीं, वह अब और अधिक आक्रामक और मजबूत अंदाज में लौट आया है। मार्को रूबियो की तरफ से आए इन ताज़ा बयानों ने बीजिंग यानी चीन और इस्लामाबाद यानी पाकिस्तान की नींद उड़ा दी है, क्योंकि अमेरिका ने स्पष्ट कर दिया है कि इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में ड्रैगन की हर एक चाल का जवाब देने के लिए वाशिंगटन और नई दिल्ली कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हैं।

अमेरिका की विदेश नीति में फिर लौटा क्वाड का दम और भारत की बढ़ती साख

पिछले कुछ वर्षों में वैश्विक मंच पर जो नाटकीय बदलाव आए हैं, उन्होंने यह साबित कर दिया है कि चीन की विस्तारवादी नीतियों और आर्थिक दादागिरी को लगाम लगाने के लिए अमेरिका को एक भरोसेमंद और मजबूत साझेदार की सख्त जरूरत है। यही वजह है कि अमेरिका के राजनीतिक गलियारों में अब यह बात सर्वविदित हो चुकी है कि भारत के बिना एशिया में किसी भी बड़ी रणनीति को अमलीजामा नहीं पहनाया जा सकता। मार्को रूबियो के बयानों से यह साफ झलकता है कि अमेरिकी प्रशासन ने इस बात को पूरी तरह स्वीकार कर लिया है कि भारत के साथ कूटनीतिक और सैन्य साझेदारी को और प्रगाढ़ करना उनकी सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल होना चाहिए। क्वाड समूह, जो कभी केवल कागजी बैठकों और बयानों तक सीमित माना जा रहा था, अब हिंद महासागर और उससे लगे सामरिक जलमार्गों पर चीन की हरकतों पर पैनी नजर रखने वाला एक बेहद प्रभावी सुरक्षा कवच बन चुका है।

ड्रैगन की आक्रामकता और पाकिस्तान के लिए मार्को रूबियो के बयानों के क्या हैं मायने?

मार्को रूबियो के तीखे और दोटूक बयानों को सीधे तौर पर चीन की विस्तारवादी मंशा और दक्षिण एशिया में अशांति फैलाने वाली ताकतों के लिए एक चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है। चीन जिस प्रकार दक्षिण चीन सागर से लेकर हिंद महासागर तक अपनी नौसैनिक ताकत का धौंस जमाने की कोशिश कर रहा है, उसका मुकाबला करने के लिए अमेरिका अब भारत के साथ अपनी खुफिया और सैन्य जानकारी साझा करने की प्रणाली को और मजबूत कर रहा है। इसके साथ ही, आतंकवाद और क्षेत्रीय अस्थिरता को बढ़ावा देने वाले पाकिस्तान जैसे देशों के लिए भी इस कूटनीतिक बदलाव में एक स्पष्ट संदेश है कि अंतरराष्ट्रीय बिरादरी अब आतंकवाद और छद्म युद्ध को बर्दाश्त करने के मूड में बिल्कुल नहीं है। जब अमेरिका और भारत जैसे दो सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश एक मंच पर आते हैं, तो यह स्वाभाविक है कि क्षेत्रीय स्तर पर अशांति फैलाने वाले देशों के नापाक इरादों पर लगाम लग जाती है।

नई दिल्ली और वाशिंगटन की मजबूत होती साझेदारी से क्यों सहमा है बीजिंग?

भारत और अमेरिका के बीच रक्षा सौदों, अंतरिक्ष अनुसंधान, अत्याधुनिक सेमीकंडक्टर तकनीक और खुफिया तंत्र के आदान-प्रदान में जिस तेजी से बढ़ोतरी हुई है, उससे चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की मुश्किलें लगातार बढ़ती जा रही हैं। बीजिंग के रणनीतिकारों को यह बात अच्छी तरह समझ आ चुकी है कि भारत अब किसी भी बाहरी दबाव या धमकियों के आगे झुकने वाला देश नहीं है, बल्कि वह अपनी शर्तों पर दुनिया के साथ संबंध तय करता है। मार्को रूबियो जैसे वरिष्ठ अमेरिकी नेताओं का यह रुख इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि आने वाले समय में अमेरिका, भारत को केवल एक व्यापारिक साझेदार के रूप में नहीं, बल्कि एशिया में लोकतंत्र और कानून के राज की रक्षा करने वाले एक मुख्य स्तंभ के रूप में देखता है। क्वाड के पुनरुत्थान से यह साफ हो गया है कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में किसी भी एक देश की दादागिरी अब नहीं चलेगी और समुद्र की स्वतंत्रता हर हाल में सुनिश्चित की जाएगी।

वैश्विक कूटनीति में भारत की केंद्रीय भूमिका और भविष्य का नया भू-राजनीतिक परिदृश्य

आज का भारत वैश्विक राजनीति में 'किंगमेकर' की भूमिका निभा रहा है, जो पश्चिमी देशों और पूर्वी शक्तियों दोनों के साथ अपने स्वतंत्र राष्ट्रीय हितों के आधार पर संबंध बनाए हुए है। क्वाड का यह नया और आक्रामक स्वरूप इस बात का प्रतीक है कि भारत की सामरिक स्वायत्तता को अब वैश्विक स्तर पर पूर्ण सम्मान मिल रहा है। मार्को रूबियो के बयानों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वाशिंगटन को यह यथार्थ समझ आ चुका है कि यदि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला और अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों को सुरक्षित रखना है, तो भारत का साथ होना सबसे बड़ी जरूरत है। चीन और पाकिस्तान की हरकतों पर लगाम कसने के लिए यह कूटनीतिक घेराबंदी आने वाले दशकों में दुनिया की राजनीति की दिशा और दशा तय करने वाली है, जिससे यह साबित होता है कि भारत के बिना अब ग्लोबल सुपरपावर की कोई भी रणनीति सफल नहीं हो सकती।