टाइगर श्रॉफ फायरिंग केस: महज 34,000 और विदेश में नौकरी का लालच... कैलिफोर्निया से रची गई बॉलीवुड को दहलाने की साजिश!
बॉलीवुड अभिनेता टाइगर श्रॉफ से जुड़े हालिया गोलीबारी मामले में पुलिस जांच ने एक संगठित और अंतरराज्यीय साजिश की परतें खोल दी हैं। जांच एजेंसियों की पड़ताल में खुलासा हुआ है कि इस वारदात को अंजाम देने के लिए शूटरों को महज 34,000 रुपये का अनुबंध और विदेश में नौकरी दिलाने का झांसा दिया गया था। इस पूरी साजिश के तार सात समंदर पार अमेरिका के कैलिफोर्निया से जुड़े बताए जा रहे हैं, जहां बैठकर अनिल पंडित नामक कथित मास्टरमाइंड इस सिंडिकेट को संचालित कर रहा था। राजस्थान के कोटा स्थित रेलवे कॉलोनी पुलिस स्टेशन में मुंबई पुलिस की गिरफ्त में मौजूद तीनों आरोपियों से रात भर तीन चरणों में कड़ी पूछताछ हुई, जिसमें कई अहम और चौंकाने वाले सुराग हाथ लगे हैं। कागजी औपचारिकताएं पूरी होने के बाद मंगलवार, 20 अक्टूबर को सुबह करीब 8 बजे पुलिस टीम तीनों को सड़क मार्ग से मुंबई रवाना करने की तैयारी में जुट गई।
जांच में सामने आया कि गिरोह का यह नेटवर्क पूरी तरह डिजिटल और 'नो-फेस कॉन्टैक्ट' मॉडल पर काम कर रहा था। शूटर कभी भी अपने हैंडलर अनिल पंडित से व्यक्तिगत रूप से नहीं मिले थे। बातचीत के लिए सुरक्षित माने जाने वाले 'जांगी' (Jangi) ऐप का सहारा लिया गया, जहां बिना किसी फोन नंबर या निजी पहचान के प्रोफाइल बन जाती है। डिजिटल ट्रैकिंग से बचने के लिए बातचीत होते ही सिम कार्ड तोड़कर फेंक दिए जाते थे। मुंबई में रुकने के दौरान शूटरों के रोजमर्रा के खर्चों के लिए 5,000 से 10,000 रुपये तक की रकम भेजी जा रही थी। बैंक खातों के जरिए पुलिस की रडार पर आने से बचने के लिए आरोपियों ने शातिर तरीका अपनाया था; वे स्थानीय दुकानदारों और अजनबियों के यूपीआई क्यूआर कोड स्कैन कर सीधे पंडित से पैसे ट्रांसफर करवा लेते थे और उनसे कैश ले लेते थे।
वारदात को अंजाम देने के बाद पुलिस को चकमा देने की योजना भी बेहद शातिर तरीके से बनाई गई थी। गोलीबारी के फौरन बाद आरोपी अंधेरी रेलवे स्टेशन पहुंचे और भीड़भाड़ वाली लोकल ट्रेन में चढ़े, लेकिन जांच एजेंसियों को भटकाने के लिए सिर्फ दो-तीन स्टेशन बाद ही नीचे उतर गए। इसके बाद सूरत के लिए ऑनलाइन कैब बुक की गई, जिसका भुगतान भी कैलिफोर्निया बैठे हैंडलर ने ऑनलाइन किया। सूरत पहुंचकर तीनों पुणे-जयपुर एक्सप्रेस ट्रेन में सवार हो गए। रास्ते में पुलिस से पहचान छिपाने के लिए तीनों ने अपने बाल कटवा लिए और हुलिया पूरी तरह बदल लिया। जब कोटा में पुलिस ने इन्हें दबोचा, तब उनके पास सिर्फ कपड़ों से भरा बैग मिला, कोई हथियार नहीं था। अंदेशा जताया जा रहा है कि हथियार रास्ते में ही ठिकाने लगा दिए गए। वहीं, वारदात में इस्तेमाल चोरी की बाइक का इंतजाम ऋतिक नाम के एक आरोपी ने किया था।
हथियारों की सप्लाई चेन भी पूरी तरह 'डेड ड्रॉप' तकनीक पर आधारित थी। शूटरों को हथियार थमाने कोई शख्स सामने नहीं आया, बल्कि इंदौर और मुंबई में नेटवर्क के जरिए कचरे के ढेर के पास रखे बक्सों में हथियार छिपाए गए थे। इसके बाद शूटरों को उस जगह की लोकेशन और वीडियो क्लिप भेजकर हथियार उठाने का निर्देश दिया गया था। जांच का दायरा अब महाराष्ट्र और राजस्थान से आगे बढ़कर पंजाब तक फैल चुका है। पकड़े गए आरोपियों में से दो—रेहान और फूल सिंह—का आपराधिक रिकॉर्ड खंगालने पर पता चला है कि वे इससे पहले अमृतसर में एक स्थानीय व्यापारी पर हुए जानलेवा हमले में भी शामिल रह चुके हैं। मुंबई पुलिस अब इस गिरोह के हथियारों के मुख्य स्रोत, विदेशी फंडिंग नेटवर्क और पुराने हमलों के आपसी कनेक्शन की कड़ियां जोड़ने में जुटी है।