पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा कौन हैं? CEC विवाद पर दिया बड़ा बयान

पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा कौन हैं? CEC विवाद पर दिया बड़ा बयान

देश की राजनीति, लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं और भारतीय चुनाव आयोग (ECI) से जुड़ी हलचलों के बीच इस समय पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा (Ashok Lavasa) का नाम जबरदस्त सुर्खियों में छाया हुआ है। 1980 बैच के हरियाणा कैडर के पूर्व वरिष्ठ आईएएस अधिकारी (IAS Officer) अशोक लवासा जनवरी 2018 से अगस्त 2020 तक भारत के चुनाव आयुक्त के रूप में अपनी सेवाएं दे चुके हैं। वे केंद्रीय वित्त सचिव (Finance Secretary) और नागरिक उड्डयन सचिव जैसे अत्यंत प्रतिष्ठित पदों पर भी अपनी प्रशासनिक धाक जमा चुके हैं। हालांकि, वर्ष 2019 के आम चुनावों के दौरान जब चुनाव आयोग द्वारा तत्कालीन सत्तारूढ़ नेताओं को आचार संहिता उल्लंघन के मामलों में क्लीन चिट दी जा रही थी, तब अशोक लवासा ने असहमति (Dissent) दर्ज कराकर निष्पक्षता की एक मिसाल कायम की थी। बाद में 2020 में उन्होंने एशियाई विकास बैंक (ADB) के उपाध्यक्ष पद की जिम्मेदारी संभालने के लिए अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। आज जब भारतीय चुनाव आयोग की साख और वोटर लिस्ट में संशोधन (SIR) की प्रक्रिया को लेकर विवाद गहराया हुआ है, तब अशोक लवासा के ताजा और बेबाक बयानों ने देश के राजनीतिक बहस को एक बिल्कुल नया मोड़ दे दिया है।

CEC विवाद और SIR प्रक्रिया पर अशोक लवासा का बड़ा हमला: "अगर अंपायर निष्पक्ष नहीं दिखेगा तो विजेता की जीत पर भी उठेंगे सवाल"

हाल ही में चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली, मतदाता सूची में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की प्रक्रिया और मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार से जुड़े विवाद पर प्रतिक्रिया देते हुए अशोक लवासा ने बेहद कड़े और विचारणीय सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने एक सार्वजनिक मंच से बेबाक लहजे में कहा कि "लोकतंत्र में चुनाव आयोग की भूमिका एक अंपायर जैसी होती है। यदि आम जनता को यह लगने लगे कि अंपायर निष्पक्ष नहीं है या पक्षपात कर रहा है, तो लोग अंततः जीतने वाली टीम की जीत पर भी सवाल उठाना शुरू कर देंगे।" लवासा ने मतदाता सूची संशोधन के तरीके (SIR) को 'अवधारणात्मक रूप से गलत' (Conceptually Flawed) करार देते हुए कहा कि किसी भी मतदाता के डेटा में विसंगति होने का मतलब यह कतई नहीं है कि उसे मतदान के अधिकार से ही अयोग्य घोषित कर दिया जाए। उन्होंने स्पष्ट किया कि नियम बदलने और फॉर्म-6 में संशोधन करने का अधिकार आयोग के पास बिना सरकारी अनुमति के नहीं था, जिससे संस्था की साख पर गहरा धक्का लगा है।

विपक्षी 'इंडिया अलायंस' क्यों है गदगद और अशोक लवासा के इस बयान के क्या निकाले जा रहे हैं राजनीतिक मायने?

अशोक लवासा के इस बयान के सामने आते ही विपक्षी गठबंधन 'इंडिया अलायंस' (INDIA Alliance) के खेमे में जबरदस्त उत्साह और खुशी की लहर दौड़ गई है। कांग्रेस, टीएमसी, सपा और अन्य विपक्षी पार्टियां पिछले कई हफ्तों से लगातार चुनाव आयोग पर निष्पक्षता खोने, वोटर लिस्ट से चुनिंदा मतदाताओं के नाम काटने और 'फिक्स्ड' चुनाव कराने का आरोप लगाती आ रही हैं। ऐसे में चुनाव आयोग के ही एक पूर्व दिग्गज अधिकारी द्वारा आयोग की प्रक्रिया और साख पर उठाए गए इन तीखे सवालों ने विपक्ष के आरोपों को बहुत बड़ा नैतिक और रणनीतिक बल प्रदान कर दिया है। विपक्षी नेताओं का कहना है कि जो बात वे महीनों से कह रहे थे, आज चुनाव आयोग के पूर्व शीर्ष अधिकारी ने भी उसी सच्चाई पर मुहर लगा दी है। अब 'इंडिया गठबंधन' इस बयान को सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई से लेकर सड़क के राजनीतिक मंचों तक सरकार और चुनाव आयोग को घेरने के लिए एक मजबूत हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रहा है।

क्या चुनाव आयोग दोबारा हासिल कर पाएगा जनता का विश्वास? संस्थागत साख पर खड़े हो रहे हैं यक्ष प्रश्न

अशोक लवासा ने अपने वक्तव्य के अंत में यह चिंता भी जताई कि पिछले 16 महीनों के दौरान देश के नागरिकों में अपने वोटिंग अधिकार को खोने का जो अनूठा डर देखने को मिला है, वह हमारे लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए बेहद खतरनाक और दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने चुनाव आयोग से भावुक अपील करते हुए कहा कि आयोग का दर्जा भारत की सभी संवैधानिक संस्थाओं में संभवतः सबसे ऊंचा है, इसलिए वर्तमान चुनाव आयुक्तों को तुरंत आगे आकर पारदर्शिता अपनानी चाहिए और जनता का खोया हुआ भरोसा दोबारा हासिल करने के ठोस प्रयास करने चाहिए। बहरहाल, जब तक चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट की तरफ से इन कानूनी व प्रक्रियात्मक बिंदुओं पर कोई अंतिम स्थिति साफ नहीं होती, तब तक अशोक लवासा का यह बयान भारतीय चुनाव व्यवस्था और देश की राजनीति में एक मील का पत्थर बनकर गूंजता रहेगा।