बचने के लिए सिर्फ 25 दिन! पराली पर केंद्र का सबसे सख्त रुख, 5 राज्यों को दी अंतिम चेतावनी!
धान की कटाई और रबी फसलों की बुवाई के पीक सीजन से ठीक पहले केंद्र सरकार ने दिल्ली-एनसीआर समेत उत्तर और मध्य भारत में वायु प्रदूषण की रोकथाम के लिए कड़ा रुख अख्तियार कर लिया है। मंगलवार को केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान और पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव की संयुक्त अध्यक्षता में हुई उच्च स्तरीय अंतर-मंत्रालयी बैठक में मध्य प्रदेश, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा और दिल्ली-एनसीआर के प्रशासनों को 'मिशन मोड' में उतरने के स्पष्ट निर्देश दिए गए। दोनों मंत्रियों ने राज्यों के कृषि मंत्रियों और वरिष्ठ अधिकारियों को सख्त हिदायत दी कि धान कटाई और गेहूं की बुवाई के बीच बमुश्किल 20 से 25 दिन का वक्त बचा है, इसलिए अब कागजी बैठकों को छोड़कर सीधे जमीन पर युद्धस्तर पर एक्शन नजर आना चाहिए।
कृषि मंत्रालय की समीक्षा बैठक में 15 सितंबर से 12 अक्टूबर के सेटेलाइट आंकड़ों पर मंथन किया गया। राहत की बात यह रही कि हरियाणा में पराली जलाने की घटनाओं में 53.3 प्रतिशत, उत्तर प्रदेश में करीब 32 प्रतिशत और पंजाब में भी पिछले साल की तुलना में गिरावट दर्ज की गई है। इसके उलट मध्य प्रदेश और राजस्थान के आंकड़ों ने केंद्र के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं। मध्य प्रदेश में मामले 55 से उछलकर सीधे 277 पर पहुंच गए, जो 452 प्रतिशत से ज्यादा की भयावह वृद्धि है, जबकि राजस्थान में घटनाएं 20 से बढ़कर 60 हो गईं। शिवराज सिंह चौहान ने इस उछाल को गंभीर बताते हुए दोनों राज्यों को प्रभावित जिलों और गांवों की मैपिंग कर तत्काल स्पेशल एक्शन प्लान लागू करने का फरमान सुनाया। साथ ही उन्होंने पंजाब और हरियाणा को भी आगाह किया कि चूंकि अभी बड़े पैमाने पर कटाई शुरू होनी बाकी है, इसलिए वे किसी भी तरह की ढिलाई न बरतें।
बैठक में इस बात पर विशेष जोर दिया गया कि अक्टूबर के मध्य से नवंबर के मध्य तक का समय सबसे संवेदनशील होता है, जब समय की कमी और सस्ते विकल्प के चक्कर में किसान खेतों में आग लगा देते हैं। यह धुआं जहां दिल्ली-एनसीआर के एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) को गंभीर श्रेणी में धकेल देता है, वहीं जमीन की उपजाऊ क्षमता को भी खत्म करता है। केंद्रीय कृषि मंत्री ने जोर देकर कहा कि सिर्फ पाबंदी लगाने से काम नहीं चलेगा, बल्कि अन्नदाताओं को सस्ते और सुलभ तकनीकी विकल्प मुहैया कराने होंगे। सरकार का फोकस अब पराली को बोझ के बजाय कमाई का जरिया बनाने पर है, ताकि किसान अवशेषों से बायो-सीएनजी, बायो-इथेनॉल, चारा और खाद बनाकर अतिरिक्त आय कमा सकें और कार्बन क्रेडिट का लाभ भी उठा सकें।