महिला ने हाथ पर कलश रख किया 9 दिन तक निर्जला उपवास, अंधविश्वास के आगे डॉक्टर भी फेल, हुई मौत

महिला ने हाथ पर कलश रख किया 9 दिन तक निर्जला उपवास, अंधविश्वास के आगे डॉक्टर भी फेल, हुई मौत

हमारे देश में आस्था, भक्ति और परंपराओं का दायरा कई बार इतनी गहरी सीमाओं को पार कर जाता है कि वह विज्ञान, चिकित्सा और इंसानियत के लिए भी एक अबूझ पहेली बन जाता है। उत्तर प्रदेश और आसपास के ग्रामीण अंचलों में अक्सर ऐसे मामले सामने आते हैं जहां लोग अपनी गहरी धार्मिक मान्यताओं के चलते शरीर को ऐसी कठोर परीक्षाओं में झोंक देते हैं जो अंततः उनके जीवन पर भारी पड़ जाती हैं। हाल ही में एक ऐसा ही दिल दहला देने वाला और झकझोर देने वाला मामला सामने आया है, जिसने अंधविश्वास और आस्था के उस पतले दायरे पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं जहाँ इंसान अपनी जान की बाजी लगा देता है। एक महिला ने अपनी गहरी मन्नत या धार्मिक अनुष्ठान के तहत अपने हाथ पर मिट्टी का कलश (घट) रखकर लगातार नौ दिनों तक बिना अन्न और जल के कठोर निर्जला उपवास रखा। इस दौरान उसके शरीर की सहनशक्ति जवाब दे गई, और जब हालत बिगड़ने पर उसे अस्पताल ले जाया गया, तो डॉक्टरों की तमाम कोशिशें और आधुनिक चिकित्सा विज्ञान भी उसके प्राण नहीं बचा सका। यह दुखद घटना इस बात का प्रतीक है कि कैसे अंधविश्वास की आंधी में लोग अपनी और अपने परिवार की खुशियों को ताक पर रख देते हैं, जिसके परिणाम बेहद भयावह होते हैं।

क्या थी वह खौफनाक प्रथा और कैसे शुरू हुआ नौ दिनों का यह निर्जला उपवास?

घटना की शुरुआत तब हुई जब स्थानीय क्षेत्र में रहने वाली एक महिला ने अपने घर में किसी विशेष मन्नत को पूरा करने के लिए नवरात्रि या अन्य धार्मिक अनुष्ठान के दौरान कठिन साधना का मार्ग चुना। परिजनों और स्थानीय लोगों के मुताबिक, महिला ने किसी तांत्रिक या पारंपरिक अंधविश्वास के बहकावे में आकर अपने एक हाथ पर मिट्टी का कलश स्थापित कर लिया और यह संकल्प लिया कि वह लगातार नौ दिनों तक बिना एक बूंद पानी पिए और बिना अन्न का एक दाना ग्रहण किए इसी अवस्था में बैठी रहेगी। शुरुआत में जब उसने व्रत रखना शुरू किया, तो आसपास के लोगों ने उसकी इस 'तपस्या' को देवी शक्ति से जोड़कर देखना शुरू कर दिया और धीरे-धीरे वहां भीड़ जुटने लगी। अंधविश्वास के इस माहौल में किसी ने भी महिला को यह समझाने की कोशिश नहीं की कि बिना पानी के लगातार नौ दिनों तक जीवित रहना जैविक रूप से असंभव है। लगातार नौ दिनों तक शरीर को धूप, गर्मी और निर्जलीकरण (Dehydration) के हवाले रखने के कारण महिला का शरीर अंदर से पूरी तरह खोखला हो चुका था, लेकिन आस्था के नाम पर चलने वाला यह अंधा खेल बिना रुके जारी रहा।

जब डॉक्टरों के होश उड़ गए: मेडिकल साइंस भी फेल और शरीर ने तोड़ दिया दम

नौ दिनों के इस कठोर और जानलेवा उपवास के अंतिम चरणों में जब महिला की स्थिति बेहद नाजुक हो गई और वह अशुद्धि या बेहोशी की हालत में चली गई, तब जाकर परिजनों की आंखें खुलीं और उन्होंने आनन-फानन में उसे नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र या अस्पताल में भर्ती कराया। अस्पताल के डॉक्टरों ने जब महिला की जांच की, तो उनके भी होश उड़ गए। डॉक्टरों ने बताया कि लगातार नौ दिनों तक बिना पानी के रहने के कारण महिला के शरीर के प्रमुख अंग (जैसे किडनी और लीवर) पूरी तरह काम करना बंद कर चुके थे (Multiple Organ Failure), और उसके खून में टॉक्सिन बहुत ज्यादा बढ़ चुके थे। डॉक्टरों और चिकित्सा विशेषज्ञों की टीम ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी और उसे बचाने के लिए हरसंभव प्रयास किया, लेकिन शरीर का मेटाबॉलिज्म इस हद तक नष्ट हो चुका था कि आधुनिक चिकित्सा विज्ञान भी हार मान गया। कुछ ही घंटों के भीतर इलाज के दौरान महिला ने दम तोड़ दिया, जिससे अस्पताल परिसर में कोहराम मच गया और डॉक्टरों ने भी इस बात पर गहरा दुख जताया कि यदि समय रहते परिजनों ने अंधविश्वास छोड़कर उसे अस्पताल पहुंचाया होता, तो उसकी जान बच सकती थी।

अंधविश्वास का यह काला सच और समाज में फैली कुप्रथाओं के खिलाफ उठते सवाल

इस दर्दनाक घटना के सामने आने के बाद से ही स्थानीय इलाके में मातम के साथ-साथ भारी आक्रोश और चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है। सामाजिक कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों का कहना है कि आज के आधुनिक युग में भी हमारे समाज के कुछ हिस्सों में इस तरह के जानलेवा अंधविश्वास और पाखंड जड़े जमाए बैठे हैं, जो मासूम लोगों की जान ले रहे हैं। लोगों का सवाल है कि क्या आस्था का मतलब अपने शरीर को इस तरह की यातनाएं देना है? प्रशासनिक और स्वास्थ्य विभाग की टीमों ने भी इस घटना का संज्ञान लेते हुए ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता अभियान चलाने की बात कही है ताकि भविष्य में कोई भी अंधविश्वास के चक्कर में आकर अपनी जान न गंवाए। पुलिस प्रशासन ने मामले की शुरुआती जांच करते हुए शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है और यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि क्या इस अनुष्ठान के पीछे किसी ढोंगी या तांत्रिक का हाथ था जिसने महिला को ऐसा करने के लिए उकसाया था।

आस्था और विज्ञान के बीच की इस जंग में आखिर कब थमेगी ऐसी जानें जाना?

एक तरफ जहां हमारा देश विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में अंतरिक्ष तक अपनी पहुंच बना चुका है, वहीं दूसरी तरफ इस तरह की घटनाएं यह सोचने पर मजबूर कर देती हैं कि सामाजिक चेतना और शिक्षा का प्रसार अभी भी जमीनी स्तर पर कितनी दूर है। महिला की इस अकाल और दर्दनाक मौत ने उसके छोटे-छोटे बच्चों और पूरे परिवार को गहरे सदमे में छोड़ दिया है। एक तरफ जहां पूरा परिवार अपनी मां के इस अंधविश्वास के कारण बिखर चुका है, वहीं समाज के लिए यह एक बहुत बड़ा सबक है कि धर्म और आस्था के नाम पर फैले पाखंड से दूरी बनाई जानी चाहिए। यदि समय रहते समाज ने इस तरह की कुप्रथाओं का पुरजोर विरोध नहीं किया, तो भविष्य में भी ऐसे कई मासूम लोग अपनी जान गंवाते रहेंगे। इस दुखद हादसे ने एक बार फिर से यह साबित कर दिया है कि आस्था जब अंधेपन का रूप ले लेती है, तो वह वरदान नहीं बल्कि इंसान के लिए अभिशाप बन जाती है।