आ रही है वो खास तिथि, जब बहेलिए का तीर लगते ही बैकुंठ लौटे श्रीकृष्ण, तुरंत शुरू हो गया था कलयुग!
सनातन संस्कृति, पौराणिक ग्रंथों और श्रीमद्भागवत महापुराण के पन्नों को पलटें तो इस ब्रह्मांड के पालनहार भगवान श्री कृष्ण की लीलाओं और उनके इस धराधाम से प्रस्थान करने की कथा अत्यंत रहस्यमयी, मार्मिक और भावुक कर देने वाली है। द्वापर युग के अंतिम चरण में जब भगवान श्री कृष्ण ने अपने सभी भूभागीय और मानवीय कर्तव्यों को सफलतापूर्वक पूरा कर लिया था, तब वह समय भी आ पहुंचा था जब उन्हें अपनी इस नश्वर लीला का समापन करके अपने धाम यानी गोलोक या बैकुंठ वापस लौटना था। ग्रंथों में इस बात का स्पष्ट और विस्तृत उल्लेख मिलता है कि भगवान श्री कृष्ण की मृत्यु किसी साधारण बीमारी या प्राकृतिक कारणों से नहीं हुई थी, बल्कि इसके पीछे एक ऐसा पूर्व नियोजित और पौराणिक श्राप तथा दैवीय घटना थी जिसने पूरी सृष्टि का भूगोल ही बदलकर रख दिया। जब वह खास तिथि नजदीक आती है, तो देश-दुनिया के साधु-संत और सनातन धर्म के अनुयायी उस ऐतिहासिक पल को याद करके भावुक हो जाते हैं, क्योंकि उसी एक घटना के घटित होते ही इस धरती पर सत्ययुग, त्रेता और द्वापर का अंत हो गया था और जिस युग ने प्रवेश किया, उसे आज हम कलियुग के नाम से जानते हैं।
गांधारी का वह श्राप और प्रभास क्षेत्र में यदुवंशियों कासपस में विनाश
इस पूरी घटना की पृष्ठभूमि महाभारत युद्ध के ठीक बाद रची जा चुकी थी जब कौरवों की माता गांधारी ने अपने पुत्रों के सर्वनाश का पूरा ठीकरा भगवान श्री कृष्ण पर फोड़ते हुए उन्हें यह श्राप दिया था कि जिस प्रकार उनके भरे-पूरे यदुवंश का नाश हुआ है, ठीक उसी प्रकार यदुवंश के सभी लोग भी आपसी कलह और गृहकलह के कारण एक-दूसरे का संहार कर डालेंगे और अंत में भगवान श्री कृष्ण को भी बेहद अपमानजनक और कष्टदायक तरीके से अपनी देह त्यागनी पड़ेगी। गांधारी के उस शाप का असर कुछ ही वर्षों में दिखने लगा। द्वारका नगरी में रहने वाले यदुवंशी अहंकार और विलासिता के मद में चूर होकर आपसी मदमस्त खेलों में उलझ गए और एक भयंकर श्राप के प्रभाव के कारण वे मूसल युद्ध के दौरान आपस में ही लड़कर समाप्त हो गए। अपने पूरे कुल का इस प्रकार अपनी ही आंखों के सामने सर्वनाश हो जाने के बाद भगवान श्री कृष्ण अत्यंत खिन्न और शांत हो गए और वे द्वारका छोड़कर गुजरात के प्रभास क्षेत्र में एक पवित्र पीपल के पेड़ के नीचे योगनिद्रा की मुद्रा में विश्राम करने के लिए चले गए।
बहेलिए जरा का वह तीर और भगवान श्री कृष्ण का बैकुंठ गमन
प्रभास क्षेत्र के उस घने जंगल में जब भगवान श्री कृष्ण एक पीपल के नीचे लेटे हुए थे और उनका एक पैर मुड़ा हुआ था, जिससे उनके पैर का चमकता हुआ तलवा किसी को हिरण के मुख जैसा भ्रम पैदा कर रहा था, तभी वहां जरा नामक एक बहेलिए (शिकारी) का आगमन हुआ। जरा उस समय जंगल में शिकार की तलाश में घूम रहा था और उसने दूर से हिरण के भ्रम में अपना एक तीर छोड़ दिया जो सीधे जाकर भगवान श्री कृष्ण के कोमल चरणों के तलवे में जा धंसा। जैसे ही तीर लगा, जरा दौड़ते हुए वहां पहुंचा और उसने देखा कि उसने किसी साधारण पशु को नहीं बल्कि स्वयं चतुर्भूज भगवान श्री कृष्ण को घायल कर दिया है। जरा भयभीत होकर उनके चरणों में गिर पड़ा और क्षमा मांगने लगा, लेकिन भगवान ने उसे गले लगाते हुए समझाया कि यह सब तो पूर्व निर्धारित दैवीय विधान के तहत हो रहा है और त्रेता युग में श्रीराम के रूप में बाली वध का जो ऋण बाकी था, वही इस रूप में चुकाया गया है। इसके तुरंत बाद भगवान श्री कृष्ण ने अपनी योगशक्ति से अपने भौतिक शरीर का त्याग किया और अपने दिव्य रूप में बैकुंठ धाम के लिए प्रस्थान कर गए।
श्रीकृष्ण के जाते ही धरती पर शुरू हो गया अंधकारमय कलियुग का कालखंड
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जैसे ही भगवान श्री कृष्ण ने अपनी लीला का संवरण किया और उनका यह पावन शरीर इस धराधाम से विदा हुआ, वैसे ही पृथ्वी पर से समस्त सकारात्मक और सात्विक ऊर्जा का संतुलन हिल गया। युगों-युगों से जिस कलयुग के आने की प्रतीक्षा और आशंका व्यक्त की जा रही थी, उसने उसी पल से अपनी पूरी ताकत के साथ इस धरती पर अपनी जड़ें जमाना शुरू कर दिया। जो द्वारका नगरी भगवान श्री कृष्ण के चरणों की धूल पाकर सोने की लंका जैसी चमकती थी, वह भी समुद्र के भीतर जलमग्न हो गई, ताकि कोई भी अधर्मी उस पवित्र भूमि का दुरुपयोग न कर सके। कलियुग के आगमन के साथ ही मनुष्य के भीतर धर्म, सत्य, करुणा, नैतिकता और प्रेम का हस होना शुरू हो गया और पाप, अहंकार, छल-कपट और अधर्म का बोलबाला बढ़ गया। श्रीमद्भागवत में यह चेतावनी दी गई है कि कलियुग में मनुष्य की आयु घट जाएगी, सत्य का मार्ग कठिन हो जाएगा और लोग वासनाओं के पीछे भागेंगे।
उस खास तिथि का स्मरण और सनातन संस्कृति में उसका आध्यात्मिक संदेश
श्रीकृष्ण के बैकुंठ गमन और कलियुग के आरंभ से जुड़ी यह तिथि हमें यह सिखाती है कि इस संसार में कुछ भी स्थाई नहीं है; जो आया है उसे एक दिन अपने नियत समय पर इस नश्वर संसार को छोड़कर जाना ही होता है। हालांकि, भगवान श्री कृष्ण ने अपने जाते वक्त यह भी भविष्यवाणी की थी कि भले ही कलियुग में चारों तरफ अधर्म का साम्राज्य दिखाई देगा, लेकिन जो व्यक्ति सच्चे मन से भगवान के नाम का स्मरण करेगा, हरिनाम संकीर्तन करेगा और सत्कर्मों के मार्ग पर चलेगा, वह इस कलियुग के भवसागर से आसानी से पार उतर जाएगा। जब भी वह खास तिथि आती है, तो मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना और कथाओं का आयोजन किया जाता है, ताकि लोग भगवान श्री कृष्ण के उन अंतिम पलों को याद कर सकें और अपने जीवन को अहंकार से मुक्त बनाकर भक्ति के मार्ग पर आगे बढ़ा सकें।