धनतेरस पर क्यों जलाया जाता है यम का दीपक? जानिए दक्षिण दिशा में दीप जलाने की खास मान्यता
कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि यानी धनतेरस से पांच दिवसीय रोशनी के महापर्व दीपों का उत्सव शुरू हो जाता है। धनतेरस के दिन भगवान धन्वंतरि, माता लक्ष्मी और कुबेर देव की पूजा-अर्चना के साथ ही रात के समय 'यमराज' के नाम का दीपक जलाने की सदियों पुरानी और पवित्र परंपरा है। सनातन धर्म में धनतेरस की शाम को जलाए जाने वाले इस दीपक को 'यम दीपम' या 'यम का दीपक' कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पूरे वर्ष में केवल यही एक ऐसा दिन होता है जब मृत्यु के देवता यमराज के निमित्त घर के बाहर दीपदान किया जाता है। माना जाता है कि इस रात पूरी श्रद्धा और सही नियमों के साथ यमराज को दीपक अर्पित करने से परिवार के सदस्यों को अकाल मृत्यु (असमय मौत) के भय से मुक्ति मिलती है और घर में सुख, शांति तथा आरोग्य का वास होता है।
दक्षिण दिशा में ही क्यों जलाते हैं यम का दीपक? जानिए इसके पीछे का पौराणिक और ज्योतिषीय कारण
हिंदू धर्म शास्त्रों और वास्तु शास्त्र में दिशाओं का विशेष महत्व बताया गया है, जिनमें दक्षिण दिशा को यमराज और पितरों की दिशा माना गया है। यही कारण है कि धनतेरस की रात यम का दीपक हमेशा घर के बाहर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके ही रखा जाता है। वास्तु और ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, दक्षिण दिशा से नकारात्मक ऊर्जाएं और यम का प्रभाव संचालित होता है। जब धनतेरस की रात इस दिशा में चार बत्तियों वाला यानी चौमुखी दीपक प्रज्वलित किया जाता है, तो उस दीपक का प्रकाश सभी नकारात्मक शक्तियों और बुरी ऊर्जाओं को नष्ट कर देता है। पौराणिक कथाओं में उल्लेख मिलता है कि यमराज के दूत दक्षिण दिशा से ही जीवों के प्राण हरने आते हैं, ऐसे में इस दिशा में दीप जलाकर यमराज को प्रसन्न किया जाता है ताकि वे घर-परिवार को अपनी कृपा दृष्टि प्रदान करें और किसी सदस्य को अकाल मृत्यु का सामना न करना पड़े।
यमराज के दीपक से जुड़ी पौराणिक कथा: राजा हंस और उनके पुत्र की अमर कहानी
यम का दीपक जलाने की परंपरा के पीछे हेम राजा के पुत्र की एक बेहद भावुक पौराणिक कथा जुड़ी हुई है। कथा के अनुसार, जब राजा हेम के घर पुत्र का जन्म हुआ तो ज्योतिषियों ने भविष्यवाणी की कि विवाह के चौथे दिन ही इस बालक की मृत्यु हो जाएगी। राजा ने अपने पुत्र को मृत्यु से बचाने के लिए एक ऐसी जगह भेजा जहां किसी स्त्री की परछाई भी न पड़े, लेकिन विधि के विधान के अनुसार उसका विवाह एक राजकुमारी से हो गया और विवाह के चौथे दिन यमदूत उसके प्राण लेने आ पहुंचे। जब यमदूत नवविवाहिता के विलाप को देख रहे थे, तो उनका हृदय भी द्रवित हो गया। जब यमदूतों ने यमराज से पूछा कि क्या अकाल मृत्यु से बचने का कोई उपाय है, तब यमराज ने कहा कि जो व्यक्ति कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी (धनतेरस) की रात दक्षिण दिशा में मेरे नाम का दीपदान करेगा, उसे और उसके परिवार को कभी भी अकाल मृत्यु का भय नहीं सताएगा। तभी से धनतेरस पर यम दीपदान की यह परंपरा चली आ रही है।
यम का दीपक जलाने की सही विधि और समय: भूलकर भी न करें ये गलतियां
यम का दीपक जलाते समय कुछ विशेष नियमों का पालन करना अत्यंत आवश्यक होता है ताकि इसका पूर्ण फल प्राप्त हो सके। यम का दीपक हमेशा घर के सबसे बुजुर्ग सदस्य द्वारा परिवार के सभी लोगों के सो जाने के बाद जलाया जाता है। इसके लिए आटे का एक चौमुखी (चार बत्तियों वाला) बड़ा दीपक बनाया जाता है, जिसमें सरसों का तेल या तिल का तेल डाला जाता है। घर के मुख्य द्वार के बाहर या कचरे के ढेर के पास दक्षिण दिशा की ओर मुंह करके इस दीपक को रखा जाता है। दीपक जलाते समय यमदेव से परिवार की लंबी उम्र और आरोग्य की प्रार्थना की जाती है। ध्यान रहे कि यम का दीपक जलाने के बाद उसे दोबारा पीछे मुड़कर नहीं देखना चाहिए और न ही दीपक जलाने वाला व्यक्ति तुरंत घर से बाहर जाता है। इन नियमों का पालन करने से यमराज प्रसन्न होते हैं और परिवार पर आने वाले संकट टल जाते हैं।