Opinion: माई नेम इज शमी एंड आई एम ए बॉलर, सेलेक्टर्स के सामने होगा ये तख्ती, गेंदबाज हूं, विकेट लेने का हुनर जानता हूं
भारतीय क्रिकेट का इतिहास हमेशा से ऐसे दिग्गजों के त्याग, कड़ी मेहनत और शानदार प्रदर्शन के किस्सों से भरा पड़ा है जिन्होंने मुश्किल से मुश्किल दौर में भी हार नहीं मानी और देश के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया। जब-जब भारतीय टीम संकट के भंवर में फंसी, तब-तब किसी न किसी गेंदबाज ने आगे बढ़कर अपने कटर, यॉर्कर और सीम मूवमेंट से विरोधी टीमों के मंसूबों पर पानी फेरा है। ऐसे ही एक अद्वितीय और बेमिसाल तेज गेंदबाज हैं मोहम्मद शमी। लेकिन आज के दौर में जब भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (BCCI) की चयन समिति और टीम प्रबंधन नए प्रयोगों, वर्कलोड मैनेजमेंट और युवाओं को प्राथमिकता देने की होड़ में लगा हुआ है, तब शमी जैसे अनुभवी और प्रामाणिक मैच-विनर के सामने एक बड़ा और गंभीर सवालिया निशान खड़ा दिखाई देता है। यह स्थिति मानो किसी उस साइलेंट वॉरियर की तरह है जो हाथ में एक तख्ती लेकर सेलेक्टर्स के सामने खामोशी से खड़ा होकर चिल्ला-चिल्लाकर यह कह रहा हो—'माई नेम इज शमी एंड आई एम ए बॉलर, गेंदबाज हूं, और विकेट लेने का हुनर आज भी भली-भांति जानता हूं!' किसी भी महान खिलाड़ी के लिए मैदान पर अपनी काबिलियत साबित करने से बड़ा कोई प्रमाण पत्र नहीं हो सकता, लेकिन जब अपनी ही टीम में जगह पाने के लिए रोज नए-नए फिटनेस टेस्ट और चयन के अजीबोगरीब पैमानों से गुजरना पड़े, तो यह न केवल खिलाड़ी के आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाता है बल्कि क्रिकेट प्रेमियों के दिल को भी पूरी तरह से झकझोर कर रख देता है।
मोहम्मद शमी की सीम पोजिशन और स्विंग का वह जादू जो पूरी दुनिया में बेजोड़ है
जब मोहम्मद शमी अपने रन-अप से दौड़ते हुए क्रीज के पास पहुंचते हैं और उनके हाथों से लाल या सफेद गेंद छूटती है, तो पूरी दुनिया के क्रिकेट पंडित और महानतम बल्लेबाज सिर्फ उनकी सीम पोजिशन (Seam Position) को एकटक देखते रह जाते हैं। क्रिकेट की दुनिया में अगर किसी गेंदबाज के पास सीधी और सबसे सटीक सीम पर गेंद फेंकने का हुनर है, तो वह निस्संदेह मोहम्मद शमी हैं। पिच चाहे अहमदाबाद की सपाट पट्टी हो, लॉर्ड्स की हरी घास हो या फिर मेलबर्न का उछाल भरा विकेट, शमी की गेंद हवा में लहराती हुई जब टप्पा खाती है, तो बल्लेबाज के पास सिर्फ हैरान होकर पवेलियन लौटने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं बचता। वनडे विश्व कप में जिस तरह से उन्होंने शुरुआत के कुछ मैचों में बाहर बैठने के बावजूद टीम में वापसी करते हुए विकटों की झड़ी लगाई थी, वह भारतीय क्रिकेट के पन्नों में हमेशा के लिए दर्ज हो चुका है। उन्होंने यह साबित कर दिया था कि क्लास और हुनर कभी पुराना नहीं होता, बल्कि समय के साथ वह और ज्यादा निखरता जाता है। इसके बावजूद जब भी कोई नई सीरीज आती है, तो शमी की फॉर्म के बजाय उनकी उम्र और फिटनेस पर सवाल उठाना भारतीय चयनकर्ताओं की एक पुरानी आदत सी बनती जा रही है।
फिटनेस, वर्कलोड मैनेजमेंट और चयनकर्ताओं की दोहरी नीतियों का शिकार
आधुनिक क्रिकेट में 'वर्कलोड मैनेजमेंट' और 'रोटेशन पॉलिसी' शब्द बहुत तेजी से हावी हुए हैं। बेशक तेज गेंदबाजों की फिटनेस और उनके शरीर को चोटों से बचाना बेहद जरूरी है, लेकिन जब यही नीतियां किसी मैच-विनर खिलाड़ी को लंबे समय तक टीम से दूर रखने या उसे नजरअंदाज करने का जरिया बन जाएं, तो सवाल उठना स्वाभाविक है। मोहम्मद शमी ने अपने करियर में कई बार गंभीर चोटों से जूझने के बाद नेशनल क्रिकेट अकादमी (NCA) में हफ्तों पसीना बहाकर मैदान पर दमदार वापसी की है। जब भी वे चोट से उबरकर आते हैं, तो सीधे मैच में अपनी पहली ही गेंद से वही पुरानी धार और रफ्तार दिखाते हैं। लेकिन चयनकर्ता अक्सर उन्हें सीधे अंतरराष्ट्रीय मैचों में खिलाने से हिचकिचाते हैं और उन्हें पहले घरेलू क्रिकेट या अभ्यास मैचों में अपनी मैच-फिटनेस साबित करने को कहते हैं। जबकि दूसरी तरफ कुछ ऐसे खिलाड़ियों को बिना किसी घरेलू मैच के सीधे प्लेइंग इलेवन में जगह दे दी जाती है। यह दोहरा रवैया उस खिलाड़ी के प्रति कितना न्यायसंगत है जिसने भारत को टेस्ट और वनडे क्रिकेट में अनगिनत यादगार जीत दिलाई हैं? शमी की तख्ती पर लिखा हर एक शब्द चयनकर्ताओं के इस रवैये पर एक कड़ा और तीखा प्रहार है।
युवा गेंदबाजों की भीड़ में क्यों आज भी सबसे ज्यादा जरूरी हैं शमी जैसे अनुभवी दिग्गज?
इसमें कोई दो राय नहीं है कि भारतीय क्रिकेट में मोहम्मद सिराज, प्रसिद्ध कृष्णा, आकाश दीप और कई अन्य युवा तेज गेंदबाजों का एक बहुत बड़ा और प्रतिभाशाली समूह तैयार हो रहा है, जो भविष्य के लिहाज से एक बहुत अच्छी बात है। लेकिन क्या सिर्फ युवाओं के उत्साह के दम पर ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड या दक्षिण अफ्रीका की सरजमीं पर बड़े टेस्ट मैच या आईसीसी (ICC) टूर्नामेंट के फाइनल जीते जा सकते हैं? जवाब है—बिल्कुल नहीं। बड़े मंच पर जीत हासिल करने के लिए युवाओं के जोश के साथ-साथ शमी जैसे गेंदबाजों का अनुभव, दबाव को झेलने की क्षमता और सही समय पर विकेट निकालने की चालाकी बेहद अनिवार्य होती है। शमी वह गेंदबाज हैं जो कप्तान के कहने पर किसी भी मोड़ पर पुरानी गेंद से रिवर्स स्विंग कराकर मैच का पासा पलट सकते हैं। जसप्रीत बुमराह और मोहम्मद शमी की जोड़ी जब एक साथ गेंदबाजी करती है, तो विपक्षी टीम की बल्लेबाजी लाइनअप ताश के पत्तों की तरह ढह जाती है। ऐसे में शमी को टीम से दूर रखना या उनकी अनदेखी करना भारतीय क्रिकेट टीम के अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है।
सेलेक्टर्स को समझना होगा हुनर का मोल: शमी का बल्ला नहीं, उनकी गेंद बोलती है
अक्सर देखा गया है कि मोहम्मद शमी सोशल मीडिया की चकाचौंध या बड़ी-बड़ी बयानबाजियों से हमेशा दूर रहते हैं। वे उन खिलाड़ियों में से नहीं हैं जो खुद को खबरों में बनाए रखने के लिए पीआर (PR) एजेंसियों का सहारा लें या इंटरव्यू में जाकर बड़ी-बड़ी बातें करें। शमी का जवाब हमेशा उनकी गेंद से निकलता है, जो सीधे स्टंप्स को उखाड़कर अपनी कहानी खुद ब खुद बयां करती है। चयनकर्ताओं और टीम मैनेजमेंट को यह अच्छी तरह समझना होगा कि ऐसे गेंदबाज रोज-रोज पैदा नहीं होते। शमी कोई ऐसा नाम नहीं हैं जिसे किसी सिफारिश या हमदर्दी की जरूरत हो, उन्होंने अपनी मेहनत और पसीने के एक-एक बूंद से यह मुकाम हासिल किया है। अगर आज वे मैदान पर उतरने के लिए पूरी तरह फिट हैं, तो उन्हें बिना किसी बेवजह की देरी के भारतीय टीम की नीली जर्सी सौंप देनी चाहिए। क्योंकि जब शमी मैदान पर होते हैं, तो वे सिर्फ एक गेंदबाज नहीं होते, बल्कि वे करोड़ों भारतीय क्रिकेट प्रेमियों का वह भरोसा होते हैं जो यह जानता है कि जब तक यह बंदा गेंदबाजी कर रहा है, तब तक जीत हमारी ही होगी।