मेडिकल कॉलेज में 5 साल की बच्ची का काटा पैर! अखिलेश यादव से मिला पीड़ित परिवार
उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में स्थित रानी दुर्गावती मेडिकल कॉलेज में कथित चिकित्सकीय लापरवाही के चलते पांच साल की मासूम मानवी का बायां पैर जांघ से काटे जाने का दर्दनाक मामला एक बार फिर गरमा गया है। न्याय की गुहार लगाते हुए पीड़ित परिवार लखनऊ पहुंचा और समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से मुलाकात कर अपना दुख साझा किया।
अखिलेश यादव ने इस त्रासदी पर गहरा शोक व्यक्त करते हुए पीड़ित परिवार को फौरी तौर पर आर्थिक मदद प्रदान की और दोषी चिकित्सकों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई करवाकर बच्ची को हर हाल में न्याय दिलाने का भरोसा दिलाया। सपा प्रमुख से भेंट के बाद मानवी के पिता अनिल कुमार ने बांदा के जिलाधिकारी अमित आसेरी को शिकायती पत्र सौंपकर मामले की उच्चस्तरीय और निष्पक्ष जांच की मांग उठाई है।
हादसे के बाद अस्पताल में भर्ती हुई थी बच्ची, संक्रमण ने छीना पैर
पिता अनिल कुमार द्वारा सौंपे गए शिकायती पत्र के अनुसार, 23 दिसंबर 2025 को ऊंचाई से फिसलकर गिरने की वजह से मासूम मानवी की जांघ की हड्डी टूट गई थी। गंभीर हालत को देखते हुए परिजनों ने उसे तत्काल रानी दुर्गावती मेडिकल कॉलेज बांदा में भर्ती कराया था।
पिता का सीधा आरोप है कि अस्पताल में बच्ची को वक्त पर जरूरी और उचित चिकित्सकीय उपचार नहीं मिला। डॉक्टरों की अनदेखी के चलते घाव में तेजी से गंभीर संक्रमण फैल गया और स्थिति इतनी बिगड़ गई कि मासूम की जान बचाने के नाम पर उसका बायां पैर जांघ के ऊपरी हिस्से से काटना पड़ा। परिजनों का कहना है कि यदि ड्यूटी पर तैनात चिकित्सक समय रहते निगरानी और सही इलाज करते, तो उनकी बच्ची आज जिंदगी भर के लिए दिव्यांग न होती।
दो जांच रिपोर्टों में भारी विरोधाभास, डॉक्टर की बहाली पर उठे सवाल
इस संवेदनशील मामले में प्रशासनिक जांच प्रक्रियाओं पर भी गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। शिकायती पत्र में खुलासा किया गया है कि मेडिकल कॉलेज की आंतरिक जांच समिति ने 12 फरवरी को सौंपी अपनी रिपोर्ट में पूरी घटना को आकस्मिक जटिलता करार देते हुए संबंधित डॉक्टरों को क्लीन चिट दे दी थी। इसके विपरीत तत्कालीन जिलाधिकारी के निर्देश पर मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) द्वारा 2 अप्रैल को कराई गई जांच में बिल्कुल अलग और चौंकाने वाला सच सामने आया।
सीएमओ की जांच में स्पष्ट पाया गया कि डॉ. विनीत कुमार सिंह ने 25 से 28 दिसंबर के दौरान मरीज का न तो कोई परीक्षण किया और न ही वार्ड का राउंड लिया, जिसे खुली चिकित्सकीय लापरवाही करार दिया गया। इस रिपोर्ट के आधार पर 13 अप्रैल को मेडिकल कॉलेज प्रशासन ने डॉ. विनीत को सेवामुक्त कर दिया था, लेकिन रहस्यमय तरीके से महज तीन दिन बाद 16 अप्रैल को ही बर्खास्तगी का यह आदेश रद्द कर दिया गया।