यूपी चुनाव से पहले सपा का सबसे बड़ा सरप्राइज; मैदान में नहीं उतरेंगे अखिलेश, वजह जानकर विरोधियों के उड़े होश

यूपी चुनाव से पहले सपा का सबसे बड़ा सरप्राइज; मैदान में नहीं उतरेंगे अखिलेश, वजह जानकर विरोधियों के उड़े होश

उत्तर प्रदेश के सियासी अखाड़े में सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर बड़ा दांव चल दिया है। अखिलेश यादव ने स्पष्ट घोषणा की है कि वे खुद विधानसभा का चुनाव नहीं लड़ेंगे और पार्टी की जीत के बाद सीधे मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे। सपा जहां इसे प्रदेश भर में पार्टी के चुनाव प्रचार और संगठनात्मक मजबूती पर पूरा ध्यान केंद्रित करने की सोची-समझी रणनीति बता रही है, वहीं विपक्षी दल सुभासपा ने इसे हार का डर बताते हुए तीखा हमला बोला है। हालांकि, राजनीतिक विश्लेषक इसे केवल चुनावी बिसात नहीं, बल्कि यूपी और बिहार की राजनीति के दिलचस्प इतिहास और आजमाए हुए सियासी फॉर्मूले से जोड़कर देख रहे हैं।

हिंदी पट्टी की सियासत में बिना विधानसभा चुनाव लड़े मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने का इतिहास काफी पुराना और सफल रहा है। खुद अखिलेश यादव साल 2012 में जब पहली बार पूर्ण बहुमत के साथ मुख्यमंत्री बने थे, तब वे कन्नौज से सांसद थे और उन्होंने बाद में विधान परिषद (MLC) का रास्ता चुना था। यही ट्रेंड उत्तर प्रदेश के अन्य दिग्गज नेताओं में भी दिखा। साल 1989 में जब मुलायम सिंह यादव पहली बार मुख्यमंत्री बने, तब वे भी विधान परिषद के जरिए ही सत्ता के शीर्ष पर पहुंचे थे। इसी तरह 2007 में ऐतिहासिक बहुमत हासिल करने वाली बसपा प्रमुख मायावती ने भी विधानसभा चुनाव लड़े बिना सीएम पद संभाला था और बाद में उच्च सदन की सदस्य बनी थीं।

2017 में प्रचंड बहुत बनाई थी सरकार

मौजूदा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी 2017 में जब प्रचंड बहुमत के साथ सरकार बनाई, तब वे गोरखपुर से लोकसभा सांसद थे। योगी ने अपना पहला पांच साल का कार्यकाल (2017-2022) विधान परिषद सदस्य के रूप में ही पूरा किया और 2022 में पहली बार गोरखपुर शहर सीट से विधानसभा चुनाव जीतकर दोबारा सत्ता में आए। पड़ोसी राज्य बिहार में तो यह परिपाटी और भी अनूठी रही है, जहां नीतीश कुमार ने लगभग दो दशकों तक सत्ता संभाली और दस बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, लेकिन वे एक बार भी विधानसभा का चुनाव लड़े बिना हमेशा विधान परिषद के सदस्य रहकर ही सरकार चलाते रहे।

राजनीतिक पंडितों के अनुसार, यूपी में पिछले साढ़े तीन दशकों का चुनावी ट्रेंड एक खास पैटर्न दिखाता है जिसे कई लोग सत्ता का 'शुभ संकेत' भी मानते हैं। 2007 में बसपा, 2012 में सपा और 2017 में भाजपा—तीनों ही बार जिस पार्टी को पूर्ण बहुमत मिला, उसके मुख्यमंत्री चेहरे ने विधानसभा चुनाव नहीं लड़ा था। इन नेताओं ने किसी एक सीट पर खुद को बांधने के बजाय बतौर स्टार प्रचारक सभी 403 विधानसभा क्षेत्रों में धुआंधार प्रचार कर अपनी पार्टी को ऐतिहासिक जीत दिलाई थी। अखिलेश यादव के इस ऐलान के पीछे भी यही तर्क दिया जा रहा है कि एक सीट पर प्रचार में उलझने के बजाय वे पूरे राज्य में स्वतंत्र होकर गठबंधन और पार्टी प्रत्याशियों के लिए ताकत झोंक सकेंगे, जिसे कई विश्लेषक एक परखा हुआ राजनीतिक दांव और चुनावी टोटका दोनों मान रहे हैं।