नैनीझील के लिए कैसे आफत बनीं कॉमन कार्प और बिग हेड? हर दिन निकाली जा रहीं ये मछलियां

नैनीझील के लिए कैसे आफत बनीं कॉमन कार्प और बिग हेड? हर दिन निकाली जा रहीं ये मछलियां

उत्तराखंड की प्रसिद्ध पर्यटन नगरी नैनीताल की जान मानी जाने वाली विश्वप्रसिद्ध 'नैनीझील' (Naini Lake) इन दिनों एक बेहद गंभीर और अभूतपूर्व पारिस्थितिक संकट (Ecological Crisis) से जूझ रही है। पहाड़ियों से घिरी इस प्राकृतिक और खूबसूरत झील के जलीय जीवन पर दो विशेष प्रजाति की विदेशी मछलियों—'कॉमन कार्प' (Common Carp) और 'बिग हेड' (Bighead Carp)—ने ऐसा कहर बरपाया है कि झील का पूरा पारिस्थितिकी तंत्र पूरी तरह से चरमरा गया है। ये दोनों आक्रामक प्रजातियां (Invasive Species) नैनीझील के मूल जलीय जीवन, पर्यावरण और पानी की स्वच्छता के लिए एक बहुत बड़ी आफत बन चुकी हैं। झील के प्राकृतिक संतुलन को बचाने और पानी में ऑक्सीजन के घटते स्तर को रोकने के लिए अब सिंचाई विभाग, मत्स्य विभाग और स्थानीय प्रशासन ने मिलकर एक विशेष सफाई अभियान शुरू किया है। इस अभियान के तहत हर दिन जाल बिछाकर नैनीझील से क्विंटल के हिसाब से इन खतरनाक मछलियों को बाहर निकाला जा रहा है ताकि झील के वजूद को बचाया जा सके।

कैसे बनीं 'कॉमन कार्प' और 'बिग हेड' मछलियां नैनीझील के लिए सबसे बड़ी आफत?

नैनीझील में सालों पहले जाने-अनजाने में डाली गई 'कॉमन कार्प' और 'बिग हेड' प्रजाति की मछलियों की आबादी में पिछले कुछ वर्षों में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है। ये मछलियां अपनी अत्यधिक भोजन क्षमता और तेजी से प्रजनन करने की प्रवृत्ति के लिए जानी जाती हैं। कॉमन कार्प मछली झील की सतह और तलहटी में मौजूद जलीय वनस्पति (Aquatic Vegetation) को पूरी तरह से चट कर जाती है, जिससे पानी के भीतर ऑक्सीजन बनाने वाले पौधे खत्म हो रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ, बिग हेड कार्प पानी में तैरने वाले छोटे जीवों यानी प्लैंकटन (Plankton) का इतनी तेजी से सफाया करती है कि झील की मूल और देशी प्रजाति की मछलियों—जैसे महाशीर (Mahseer)—के लिए भोजन का नामोनिशान नहीं बचता। इन दोनों प्रजातियों के अनियंत्रित दबदबे के कारण नैनीझील की जैव विविधता (Biodiversity) अब बड़े खतरे के मुहाने पर खड़ी है।

झील का पानी हो रहा जहरीला और गंदा, घट रहा है ऑक्सीजन का स्तर

इन विदेशी मछलियों की बेलगाम बढ़ती संख्या का सीधा और बहुत ही बुरा असर नैनीझील के पानी की गुणवत्ता (Water Quality) पर देखने को मिल रहा है। कॉमन कार्प मछलियां झील के निचले हिस्से में जाकर कीचड़ और तलछट को बुरी तरह से उकेरती रहती हैं, जिसकी वजह से पारदर्शी और साफ दिखने वाला नैनीझील का पानी हमेशा गंदला और मटमैला नजर आने लगा है। इसके अलावा, जलीय वनस्पतियों के नष्ट होने से झील के भीतर प्राकृतिक रूप से बनने वाली ऑक्सीजन का निर्माण ठप्प हो रहा है। विशेषज्ञों और वैज्ञानिकों का स्पष्ट कहना है कि यदि इन मछलियों की संख्या पर तुरंत काबू नहीं पाया गया, तो झील के पानी में बीओडी (BOD) का स्तर बिगड़ जाएगा, जिससे गर्मियों और सर्दियों के मौसम में पानी का रंग बदलने और बदबू फैलने जैसी गंभीर समस्याएं पैदा हो सकती हैं।

हर दिन निकाली जा रहीं ये मछलियां: प्रशासन और मत्स्य विभाग का महाअभियान

नैनीझील के बिगड़ते पर्यावरण को देखकर जिला प्रशासन, सिंचाई विभाग और पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय के मत्स्य विशेषज्ञों ने एक संयुक्त रणनीति तैयार की है। इस योजना के तहत झील में बड़े-बड़े महाजाल बिछाकर हर दिन सैकड़ों किलो की तादाद में कॉमन कार्प और बिग हेड मछलियों को बाहर निकाला जा रहा है। पकड़ी गई इन मछलियों को झील से दूर सुरक्षित स्थानों पर निस्तारित किया जा रहा है या नीलामी के जरिए खुले बाजार में बेचा जा रहा है ताकि इनसे होने वाले नुकसान को तुरंत रोका जा सके। रोजाना चलाए जा रहे इस विशेष रेस्क्यू और क्लीनिंग ऑपरेशन से झील पर दबाव कुछ हद तक कम जरूर हुआ है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इन मछलियों की कुल आबादी को नियंत्रित करने में कई महीनों का निरंतर समय लग सकता है।

देशी 'महाशीर' मछली के अस्तित्व पर गहराया संकट, विशेषज्ञ चिंतित

उत्तराखंड की नदियों और झीलों की पहचान मानी जाने वाली प्रसिद्ध 'महाशीर' (Mahseer) मछली के लिए यह परिस्थिति बेहद खौफनाक साबित हो रही है। आक्रामक बिग हेड और कॉमन कार्प मछलियों के कारण महाशीर के अंडे और छोटे बच्चे सुरक्षित नहीं रह पा रहे हैं। विदेशी मछलियां महाशीर के भोजन और प्रजनन स्थलों पर पूरी तरह कब्जा जमा चुकी हैं, जिसके चलते नैनीझील में महाशीर की संख्या लगातार घटती जा रही है। पर्यावरणविदों और कुमाऊं विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि यदि नैनीझील में महाशीर का संरक्षण नहीं किया गया, तो यह ऐतिहासिक झील अपनी मूल पहचान हमेशा के लिए खो देगी। इसलिए केवल आक्रामक मछलियों को निकालना ही काफी नहीं है, बल्कि देशी मछलियों के बीजों को दोबारा झील में डालना भी बेहद जरूरी हो गया है।

नैनीझील के संरक्षण के लिए वैज्ञानिक रणनीति और पर्यटकों से अपील

नैनीताल का पर्यटन पूरी तरह से इस खूबसूरत झील की सुंदरता और स्वच्छता पर टिका हुआ है। यदि झील का पानी दूषित होता है या दुर्गंध आती है, तो इसका सीधा नकारात्मक असर स्थानीय व्यापार और पर्यटन व्यवसाय पर पड़ेगा। वैज्ञानिकों ने सुझाव दिया है कि झील की तलहटी में ऑटोमेटेड एरेशन सिस्टम (Aeration System) के जरिए ऑक्सीजन बढ़ाने और जलीय पौधों को दोबारा रोपने की वैज्ञानिक प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए। इसके साथ ही, स्थानीय प्रशासन ने नैनीताल आने वाले पर्यटकों और स्थानीय निवासियों से भी सख्त अपील की है कि वे झील में किसी भी तरह की खाने-पीने की वस्तुएं, प्लास्टिक, आटा या दाना न फेंकें। आम लोगों द्वारा फेंकी जाने वाली खाने की चीजें इन विदेशी मछलियों के लिए मुख्य आहार बनती हैं और उनकी आबादी को बढ़ाने में मदद करती हैं। जनसहभागिता और प्रशासनिक मुस्तैदी से ही नैनीझील के इस जलीय संकट को हमेशा के लिए टाला जा सकता है।