दुकान से तुरंत हटा लें पान मसाला और गुटखा, धामी सरकार का फरमान; पकड़े गए तो मिलेगी ये सजा

दुकान से तुरंत हटा लें पान मसाला और गुटखा, धामी सरकार का फरमान; पकड़े गए तो मिलेगी ये सजा

उत्तराखंड सरकार ने जनस्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए राज्य भर में गुटखा, पान मसाला और तंबाकू व निकोटिन युक्त सभी खाद्य उत्पादों के निर्माण, भंडारण, वितरण और बिक्री पर एक साल के लिए पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है। खाद्य सुरक्षा आयुक्त द्वारा 13 अक्टूबर 2026 को जारी आधिकारिक आदेश के तहत यह कड़ा फैसला लिया गया है। आदेश का अनुपालन सुनिश्चित कराने के लिए खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम 2006 की धारा 30(2)(ए) और विनियम 2011 के प्रावधानों के तहत मुख्य सचिव, स्वास्थ्य विभाग, सभी जिलाधिकारियों और मुख्य चिकित्सा अधिकारियों को सख्त कार्रवाई के निर्देश भेजे गए हैं।

राज्य में इससे पहले वर्ष 2013, 2015 और 2019 में भी इस तरह की रोक लगाई जा चुकी है, लेकिन बाजार में इन उत्पादों की आसान उपलब्धता हमेशा एक बड़ी चुनौती बनी रही। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, भारत सरकार के ग्लोबल एडल्ट टोबैको सर्वे (GATS-2) के आंकड़ों से स्थिति की गंभीरता समझी जा सकती है, जिसके मुताबिक राज्य में 15 वर्ष या उससे अधिक आयु वर्ग के 26.5 प्रतिशत वयस्क किसी न किसी रूप में तंबाकू का सेवन करते हैं। इनमें 12.4 प्रतिशत लोग चबाने वाले तंबाकू के आदी हैं, जबकि गुटखा और तंबाकू युक्त पान मसाला खाने वालों का आंकड़ा क्रमशः 2.2 और 3.1 प्रतिशत दर्ज किया गया था।

इस बार प्रतिबंध को कागजों से निकालकर धरातल पर प्रभावी बनाने के लिए प्रशासन को बहुस्तरीय रणनीति अपनानी होगी। केवल छोटी खुदरा दुकानों पर छापे मारने से यह समस्या हल नहीं होगी, बल्कि मुख्य सप्लायर्स, थोक व्यापारियों, निर्माण इकाइयों और सीमावर्ती गोदामों पर कड़ी निगरानी रखनी होगी। उत्तराखंड की जटिल भौगोलिक संरचना—मैदानी बाजारों से लेकर सुदूर पर्वतीय गांवों तक—सख्त निगरानी में बड़ी बाधा बनती है। ऐसे में खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन और स्थानीय पुलिस के बीच बेहतर समन्वय ही चोरी-छिपे होने वाली बिक्री और अवैध सप्लाई चेन को रोक सकता है।

तंबाकू और निकोटिन न केवल शारीरिक लत पैदा करते हैं, बल्कि मुंह के कैंसर और अन्य जानलेवा बीमारियों का प्रमुख कारण भी हैं। इस प्रतिबंध की सफलता केवल प्रशासनिक सख्ती पर नहीं, बल्कि युवाओं और छात्रों के बीच व्यापक जनजागरूकता अभियानों और नशा मुक्ति परामर्श केंद्रों की सक्रियता पर भी निर्भर करेगी। अगले एक साल के दौरान नियमित सैंपलिंग, जब्ती और कानूनी कार्रवाई के आधिकारिक आंकड़े ही यह तय करेंगे कि 2026 का यह फैसला तंबाकू मुक्त उत्तराखंड की दिशा में कितना प्रभावी साबित हुआ।