यूक्रेन से जंग के 1200 दिन पूरे, रूस ने किया अब तक का सबसे खौफनाक धमाका, बारी-बारी कैसे झुलस रहे दोनों देश?
रूस और यूक्रेन के बीच जारी खूनी संघर्ष को 1200 दिन से भी अधिक का समय बीत चुका है, लेकिन युद्ध की आग शांत होने के बजाय दिन-ब-दिन और अधिक भयानक रूप धारण करती जा रही है। युद्ध के 1200वें दिन रूसी वायुसेना और मिसाइल ब्रिगेड ने यूक्रेन के प्रमुख शहरों और रणनीतिक ठिकानों पर अब तक का सबसे बड़ा और विनाशकारी मिसाइल हमला बोल दिया है। इस खौफनाक धमाके और हवाई हमले से राजधानी कीव समेत खारकीव और डनिप्रो जैसे शहर दहल उठे हैं। दूसरी ओर यूक्रेन भी खामोश बैठने के बजाय पश्चिमी देशों से मिले आधुनिक ड्रोन और मिसाइल प्रणालियों के सहारे रूसी इलाकों पर पलटवार कर रहा है। दोनों देशों के बीच जारी इस विनाशकारी जंग ने पूर्वी यूरोप को पूरी तरह तबाही के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है।
#1 रूस का अब तक का सबसे भीषण हमला और यूक्रेन के शहरों में तबाही का खौफनाक मंजर
रूस-यूक्रेन युद्ध के 1200 दिन पूरे होने पर रूसी सेना ने एक सोची-समझी रणनीति के तहत यूक्रेन के पावर ग्रिडों, सैन्य ठिकानों और रसद आपूर्ति मार्गों पर सैकड़ों हाइपरसोनिक और क्रूज मिसाइलों से एक साथ हमला किया। चश्मदीदों और स्थानीय रिपोर्टरों के मुताबिक, इस हमले के दौरान हुए धमाके इतने जोरदार थे कि कई किलोमीटर दूर तक जमीन कांपने लगी। हमले के तुरंत बाद यूक्रेन की राजधानी कीव समेत कई बड़े इलाकों की बिजली पूरी तरह गुल हो गई और वहां चारों तरफ धुएं का गुबार और तबाही का सन्नाटा छा गया। यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की ने इस हमले को नागरिक बुनियादी ढांचे पर रूसी बर्बरता का चरम करार दिया है और आपातकालीन टीमों को राहत कार्य में लगा दिया है।
#1 यूक्रेन का पलटवार और रूसी सीमाओं के भीतर बढ़ते ड्रोन व मिसाइल स्ट्राइक
रूसी हमलों से बुरी तरह झुलस रहे यूक्रेन ने भी हार नहीं मानी है और अपनी रक्षात्मक रणनीति को और आक्रामक बना दिया है। यूक्रेन की सेना ने लंबी दूरी तक मार करने वाले स्वदेशी ड्रोन और पश्चिमी तकनीक की मदद से रूसी सीमा के अंदर स्थित तेल रिफाइनरियों, गोला-बारूद के डिपो और वायुसेना ठिकानों को अपना निशाना बनाना शुरू कर दिया है। बेलगोरोद और कर्सक जैसे रूसी सीमावर्ती इलाकों में लगातार हो रहे यूक्रेनी ड्रोन हमलों ने रूस के आम नागरिकों और रक्षा विशेषज्ञों की नींद उड़ा दी है। दोनों देशों द्वारा एक-दूसरे के आर्थिक और सामरिक संसाधनों को निशाना बनाए जाने से यह जंग अब आर-पार की लड़ाई में बदल चुकी है।
#1 1200 दिनों के लंबे संघर्ष में दोनों देशों को हुआ जान-माल का भारी और अपूरणीय नुकसान
युद्ध के 1,200 दिनों के इस काले इतिहास में दोनों ही पक्षों को भारी कीमत चुकानी पड़ी है। संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के आंकड़ों के अनुसार, इस जंग में अब तक हजारों बेकसूर नागरिकों और लाखों सैनिकों की जान जा चुकी है। यूक्रेन के दर्जनों शहर पूरी तरह मलबे के ढेर में तब्दील हो चुके हैं और करोड़ों लोग शरणार्थी बनने पर मजबूर हुए हैं। वहीं दूसरी तरफ, रूस को भी पश्चिमी देशों द्वारा लगाए गए सख्त आर्थिक प्रतिबंधों, अपनी वैश्विक साख के नुकसान और हजारों प्रशिक्षित सैनिकों की शहादत का सामना करना पड़ा है। इस युद्ध ने दोनों देशों की भावी पीढ़ियों के भविष्य को गहरे संकट में डाल दिया है।
#1 पश्चिमी देशों की हथियारों की मदद और नाटो की भूमिका ने बढ़ाई युद्ध की भयावहता
रूस-यूक्रेन संघर्ष के इतने लंबे समय तक खींचने की एक मुख्य वजह अमेरिका और नाटो (NATO) देशों द्वारा यूक्रेन को दी जा रही अटूट सैन्य सहायता है। अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोपीय संघ लगातार यूक्रेन को आधुनिक एफ-16 लड़ाकू विमान, पैट्रियट एयर डिफेंस सिस्टम और लंबी दूरी की मिसाइलें मुहैया करा रहे हैं। रूस का मानना है कि पश्चिमी देश यूक्रेन के कंधे पर बंदूक रखकर रूस को कमजोर करने की साजिश रच रहे हैं, जिसके जवाब में पुतिन सरकार अपने परमाणु हथियारों के बेड़े और हाइपरसोनिक मिसाइल तकनीक का प्रदर्शन कर रही है। इस अंतरराष्ट्रीय दखल ने युद्ध विराम की किसी भी संभावना को फिलहाल पूरी तरह खत्म कर दिया है।
#1 क्या कभी रुक पाएगा यह महाविनाश और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर इसका क्या पड़ रहा है असर
रूस-यूक्रेन युद्ध का प्रभाव केवल इन दो देशों तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि इसने पूरी दुनिया की खाद्य आपूर्ति, ऊर्जा बाजार और वैश्विक अर्थव्यवस्था को हिलाकर रख दिया है। कच्चे तेल, प्राकृतिक गैस और गेहूं की कीमतों में आए उछाल ने दुनिया भर के विकासशील और गरीब देशों में महंगाई का तांडव मचा रखा है। कूटनीतिक पटल पर संयुक्त राष्ट्र समेत कई मध्यस्थ देशों की ओर से शांति वार्ता के प्रयास किए गए हैं, लेकिन दोनों पक्षों की अड़ियल शर्तों के कारण हर कोशिश नाकाम साबित हुई है। 1,200 दिन बीत जाने के बाद भी यह सवाल जस का तस बना हुआ है कि यह महाविनाश आखिर कब और किस मोड़ पर जाकर थमेगा।