पाकिस्तान की धमकी से नहीं झुका अफगानिस्तान, तालिबान ने उल्टा इस्लामाबाद को घेरा, सीमा पर फिर बढ़ा तनाव
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दक्षिण एशिया की राजनीति में एक बार फिर से पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच तनाव का पारा अपने चरम पर पहुंच गया है। आतंकवाद के खात्मे और अपनी विफलताओं का ठीकरा पड़ोसी देशों पर फोड़ने की पुरानी आदत से मजबूर पाकिस्तान ने जब एक बार फिर से अफगानिस्तान की संप्रभुता को चुनौती देते हुए खुली धमकियां दीं, तो उसे तगड़ा झटका लगा। पाकिस्तान के सैन्य हुक्मनों की धमकियों से डरने के बजाय इस बार तालिबान शासन ने पूरी आक्रामकता के साथ पलटवार किया है और इस्लामाबाद को चारों खाने चित्त करते हुए उल्टे उसी के घर में घेर लिया है। डूरंड लाइन (Durand Line) के संवेदनशील इलाकों में तालिबान ने अपनी सैन्य चौकियों को और अधिक मजबूत कर दिया है और पाकिस्तानी सेना को दो टूक शब्दों में चेतावनी दी है कि यदि उनकी जमीन पर आंख उठाने की कोशिश की गई, तो उसका अंजाम बहुत भयानक होगा। इस नाटकीय घटनाक्रम ने एक बार फिर रावलपिंडी और काबुल के बीच के रिश्तों को उस मुहाने पर ला खड़ा किया है जहां कभी भी एक बड़ा खूनी संघर्ष छिड़ सकता है।
पाकिस्तान पिछले कुछ महीनों से अपने देश के भीतर बढ़ रहे उग्रवाद और आर्थिक बदहाली से बुरी तरह परेशान है। अपनी आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था को संभालने में नाकाम रहने वाली पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई और सेना अपनी नाकामियों को छुपाने के लिए हमेशा की तरह अफगानिस्तान पर दबाव बनाने की रणनीति अपना रही थी। उन्हें यह गलतफहमी थी कि जिस देश को उन्होंने दशकों तक प्रॉक्सी वॉर के जरिए नियंत्रित किया है, वह आज भी उनकी हर बात आंखें बंद करके मान लेगा। लेकिन तालिबान के सत्ता में आने के बाद समीकरण पूरी तरह बदल चुके हैं। काबुल की हुकूमत ने पाकिस्तान की किसी भी धमकी को सिरे से खारिज करते हुए सीमावर्ती इलाकों में अपनी रक्षात्मक और आक्रामक तैयारियों को पुख्ता कर लिया है, जिससे पाकिस्तानी जनरलों के होश उड़े हुए हैं।
डूरंड लाइन पर सुलगता बारूद और पाकिस्तानी धमकियों की खुली हवा में फजीहत
पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच सबसे बड़ा विवाद अंग्रेजों के समय खींची गई डूरंड लाइन को लेकर है, जिसे आज तक किसी भी अफगान सरकार ने अंतरराष्ट्रीय सीमा के रूप में आधिकारिक तौर पर स्वीकार नहीं किया है। पाकिस्तानी सेना इस सीमा पर अपनी मर्जी से फेंसिंग (बाड़ लगाना) करने और अवैध चौकियां स्थापित करने की कोशिश करती रही है, जिसका तालिबानी लड़ाके लगातार और कड़ा विरोध करते आए हैं। हाल ही में जब पाकिस्तानी रक्षा मंत्रियों और सेना प्रमुखों ने अफगानिस्तान के भीतर घुसकर सैन्य कार्रवाई करने की गीदड़ भभकियां दीं, तो तालिबान के रक्षा मंत्रालय ने बेहद कड़े शब्दों में एक आधिकारिक बयान जारी कर पाकिस्तान को उसकी औकात याद दिला दी।
तालिबान ने स्पष्ट रूप से कहा कि अफगानिस्तान एक संप्रभु और स्वतंत्र राष्ट्र है, और वह किसी भी बाहरी देश की आंखें तरेरने या धमकियों से डरने वाला नहीं है। पाकिस्तानी सेना द्वारा सीमा के उस पार की गई गोलीबारी और मोर्टार हमलों का जवाब देते हुए तालिबान के जवानों ने भी मोर्चे संभाल लिए और कई पाकिस्तानी चौकियों को मुंहतोड़ जवाब दिया। सीमा पर टैंकों, भारी तोपखाने और सशस्त्र लड़ाकों की तैनाती से वहां का माहौल बेहद तनावपूर्ण हो चुका है। स्थानीय ग्रामीण अपनी जान बचाने के लिए सुरक्षित ठिकानों की ओर पलायन करने को मजबूर हो गए हैं, जिससे क्षेत्र में एक बार फिर से भारी मानवीय संकट के बादल मंडराने लगे हैं।
अपनी ही बुनी हुई साजिश के जाल में फंस गया है पाकिस्तान
कूटनीतिक जानकारों का मानना है कि पाकिस्तान ने अपने देश में पल रहे आंतरिक आतंकवाद (जैसे TTP और अन्य उग्रवादी गुटों) से जनता का ध्यान भटकाने के लिए यह कृत्रिम युद्ध जैसा माहौल तैयार किया है। पाकिस्तान दुनिया को यह दिखाना चाहता है कि उसके देश में होने वाले आतंकी हमलों के पीछे अफगानिस्तान की धरती का इस्तेमाल हो रहा है। लेकिन इस बार अमेरिका, रूस और अन्य क्षेत्रीय देश भी पाकिस्तान की इस दोहरी चाल को अच्छी तरह समझ चुके हैं। दशकों तक आतंकवाद को पालने-पोसने वाले पाकिस्तान को अब उसी का कांटा चुभ रहा है, जिसे वह चाहकर भी बाहर नहीं निकाल पा रहा है।
तालिबान ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर और द्विपक्षीय वार्ताओं के दौरान बार-बार यह साबित किया है कि पाकिस्तान अपनी आंतरिक अव्यवस्था और आर्थिक बदहाली की विफलता को छिपाने के लिए अफगानिस्तान पर झूठे आरोप मढ़ रहा है। जब पाकिस्तानी हुक्मनों ने सोचा था कि वे धमकियों के बल पर तालिबान को झुका लेंगे, तब तालिबान के आक्रामक और बेबाक रुख ने इस्लामाबाद के रणनीतिकारों को सकते में डाल दिया है। पाकिस्तान के पास अब न तो आर्थिक ताकत बची है कि वह किसी लंबे सीमा संघर्ष में उलझे, और न ही उसके पास कूटनीतिक रूप से कोई ऐसा मित्र बचा है जो इस मामले में खुला समर्थन दे सके।
क्षेत्रीय सुरक्षा पर मंडराते खतरे और भारत सहित अन्य देशों की पैनी नजर
पाकिस्तानी सीमा पर बढ़ रहे इस तनाव का असर पूरे दक्षिण एशिया की सुरक्षा व्यवस्था पर पड़ रहा है। यदि यह सीमा विवाद बड़े सैन्य संघर्ष में तब्दील होता है, तो मध्य एशिया और दक्षिण एशिया के बीच व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और शांति के प्रयासों को भारी झटका लग सकता है। भारत सहित दुनिया के तमाम बड़े देश इस पूरे घटनाक्रम पर बेहद बारीकी से नजर बनाए हुए हैं। भारत की हमेशा से यह नीति रही है कि पड़ोसी देशों में स्थिरता और शांति बनी रहे, लेकिन पाकिस्तान की विस्तारवादी और अस्थिर करने वाली नीतियां हमेशा से इस क्षेत्र के विकास में सबसे बड़ा रोड़ा रही हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि तालिबान का यह कड़ा रुख इस बात का संकेत है कि अब दक्षिण एशिया में कोई भी देश पाकिस्तान की धौंस जमाने वाली दादागिरी को सहन करने के मूड में नहीं है। पाकिस्तान की सेना जो कभी खुद को इस क्षेत्र की सबसे ताकतवर फौज समझती थी, आज अपनी ही बनाई नीतियों के मकड़जाल में बुरी तरह उलझ चुकी है। सीमा पर लगातार बढ़ता तनाव और तालिबान का आक्रामक तेवर इस बात की गवाही दे रहा है कि आने वाले दिनों में पाकिस्तान की मुश्किलें और अधिक बढ़ने वाली हैं।
निष्कर्ष: पाकिस्तान के लिए सबक और भविष्य की अनिश्चितता
पाकिस्तान की धमकी से न झुकना और उल्टे इस्लामाबाद को कटघरे में खड़ा करना तालिबान की बदली हुई राजनीतिक और रणनीतिक सोच को दर्शाता है। जिस देश ने कभी तालिबान को खड़ा करने में अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी, आज वही देश उनके लिए सबसे बड़ा दुश्मन बन चुका है। डूरंड लाइन पर सुलगती आग और दोनों पक्षों के बीच बढ़ती तल्खी यह बताती है कि दक्षिण एशिया की भू-राजनीति में अभी कई और बड़े उलटफेर देखने को मिलेंगे। पाकिस्तान के हुक्मरानों को अब यह समझ लेना चाहिए कि धमकियों और युद्ध के बल पर वे अपनी आंतरिक असफलताओं को अब और अधिक दिनों तक छुपा नहीं सकते हैं।
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