पाकिस्तान में फिर हैवानियत, जला दिए ईसाई फैमिली के घर-दुकान, गांव छोड़कर भागे 35 परिवार
पड़ोसी देश पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के खिलाफ हो रही हिंसा और क्रूरता का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। आए दिन वहां से ऐसी खौफनाक और दिल दहला देने वाली तस्वीरें सामने आती हैं, जो मानवता को शर्मसार कर देती हैं। एक बार फिर वहां धार्मिक उन्माद और कट्टरता का ऐसा ही अमानवीय चेहरा देखने को मिला है, जिसने पूरी दुनिया के मानवाधिकार प्रेमियों को झकझोर कर रख दिया है। ताजा मामला पाकिस्तान के पंजाब प्रांत से जुड़ा है, जहां एक बार फिर से ईसाई समुदाय को निशाना बनाया गया है। असामाजिक तत्वों और कट्टरपंथियों की भीड़ ने कानून को अपने हाथ में लेते हुए निर्दोष ईसाई परिवारों के घरों और उनकी आजीविका का एकमात्र साधन यानी दुकानों को आग के हवाले कर दिया। इस सुनियोजित और खौफनाक हिंसा के बाद से पूरे इलाके में दहशत का माहौल है और पीड़ित परिवार अपनी जान बचाने के लिए अपने ही घरों को छोड़कर सुरक्षित ठिकानों की ओर पलायन करने को मजबूर हो गए हैं। इस घटना ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि पाकिस्तान में गैर-मुस्लिम नागरिकों का जीवन कितना असुरक्षित और त्रासद हो चुका है।
मनगढ़ंत और झूठे आरोपों की आड़ में रची गई हिंसा की खतरनाक साजिश
पाकिस्तान में अक्सर अल्पसंख्यकों को प्रताड़ित करने और उन्हें उनकी जमीनों से बेदखल करने के लिए धर्म की आड़ का सहारा लिया जाता है। इस बार भी इस खूनी खेल की शुरुआत एक बेहद मामूली और मनगढ़ंत बहाने से हुई। कट्टरपंथी भीड़ ने बिना किसी ठोस जांच या प्रमाण के ईसाई समुदाय के लोगों पर तथाकथित धार्मिक भावनाओं को आहत करने या ईशनिंदा का झूठा और बेबुनियाद आरोप मढ़ दिया। पाकिस्तान के सामाजिक ताने-बाने में ईशनिंदा का आरोप किसी मौत के फरमान से कम नहीं माना जाता, जहां बिना किसी सुनवाई के भीड़ खुद जज और जल्लाद की भूमिका निभाते हुए तबाही मचाने लगती है। इस मामले में भी यही हुआ; सोशल मीडिया और स्थानीय स्तर पर अफवाहों का ऐसा बाजार गर्म किया गया कि कुछ ही घंटों में सैकड़ों की संख्या में उपद्रवी हथियार और पेट्रोल बम लेकर ईसाई बहुल इलाके में आ धमके। इन कट्टरपंथियों का मकसद साफ था कि वे अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को इतना डरा दें कि वे हमेशा-हमेशा के लिए उस इलाके को छोड़कर भागने पर मजबूर हो जाएं।
देखते ही देखते धू-धू कर जल उठे आशियाने और जीवनभर की कमाई
जब धार्मिक उन्माद से भरी भीड़ ने अचानक हमला बोला, तो उस छोटे से गांव के ईसाई परिवारों को संभलने का मौका तक नहीं मिला। उपद्रवियों ने घरों के दरवाजे तोड़कर अंदर तोड़फोड़ शुरू कर दी और घरों में रखा सामान सड़कों पर लाकर उसमें आग लगा दी। जिन घरों को लोगों ने अपनी जिंदगीभर की गाढ़ी कमाई और खून-पसीने से सींचा था, वे कुछ ही पलों में राख के ढेर में तब्दील हो गए। इतना ही नहीं, समुदाय के लोगों की जो छोटी-मोटी दुकानें थीं, उन्हें भी चुन-चुनकर निशाना बनाया गया और आग के हवाले कर दिया गया। आग की लपटों और धुएं के गुबार से पूरे आसमान में काला साया छा गया था, और बच्चों तथा महिलाओं की चीख-पुकार से वहां का माहौल बेहद खौफनाक हो गया था। उपद्रवियों की क्रूरता का आलम यह था कि वे लोगों को पीट रहे थे और उनके धार्मिक प्रतीकों व पूजास्थलों को भी अपवित्र करने में लगे हुए थे। स्थानीय प्रशासन और पुलिस के नुमाइंदे इस पूरी घटना के दौरान मूकदर्शक बने रहे, जिससे कट्टरपंथियों के हौसले और अधिक बुलंद हो गए।
अपनी अस्मिता और जान बचाने के लिए गांव छोड़कर भागे 35 परिवार
इस खौफनाक हिंसा और बर्बरता के तांडव के बाद प्रभावित इलाके के 35 से अधिक ईसाई परिवार पूरी तरह बेसहारा हो चुके हैं। उनके पास न तो सिर पर छत बची है और न ही खाने-पीने का कोई सामान। अपनी जान बचाने और बच्चों की हिफाजत की खातिर इन बदकिस्मत परिवारों को रातों-रात अपना पुश्तैनी गांव और घर-बार छोड़कर जंगलों और नजदीकी सुरक्षित स्थानों की तरफ भागना पड़ा। सोचिए उस मानसिक वेदना और आतंक के बारे में, जब किसी को अपनी ही मातृभूमि पर सिर्फ इसलिए अपना घर छोड़ना पड़े क्योंकि उसका धर्म दूसरा है। खुले आसमान के नीचे ठंड और डर के साए में दिन गुजार रहे इन परिवारों के चेहरों पर खौफ साफ पढ़ा जा सकता है। महिलाओं और बुजुर्गों का रो-रोकर बुरा हाल है, और वे यह समझ नहीं पा रहे हैं कि आखिर उन्होंने ऐसा कौन सा गुनाह कर दिया था जिसकी सजा उन्हें इस तरह घर जलाकर और बेघर करके दी गई है। यह पलायन केवल 35 परिवारों का नहीं है, बल्कि यह पाकिस्तान में न्याय, कानून और मानवता के पतन की सबसे बड़ी दास्तान है।
अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों की चुप्पी और पाकिस्तान सरकार की विफलता
पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के साथ होने वाली इस तरह की घटनाएं कोई नई बात नहीं हैं, लेकिन विडंबना यह है कि वहां की सरकार और तंत्र हर बार ऐसे मामलों में लीपापोती करने में जुट जाते हैं। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन और संयुक्त राष्ट्र समय-समय पर पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के अधिकारों के हनन पर चिंता तो जताते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर कोई ठोस और कड़े कूटनीतिक कदम न उठाए जाने के कारण वहां के हुक्मरानों और कट्टरपंथियों के हौसले लगातार मजबूत होते जा रहे हैं। पाकिस्तान का संविधान और कानून भले ही कागजों पर सभी नागरिकों को समान अधिकार देने की बात करता हो, लेकिन असलियत में वहां की न्याय व्यवस्था कट्टरपंथी ताश के पत्तों के आगे पूरी तरह घुटने टेक चुकी है। इन घटनाओं पर वहां के मुख्यधारा के राजनेताओं की चुप्पी भी इस बात का प्रमाण है कि वे वोट बैंक की राजनीति के चलते इन अपराधियों के खिलाफ खड़े होने की हिम्मत नहीं जुटा पाते। परिणाम यह है कि आए दिन कभी मंदिरों, कभी गुरुद्वारों तो कभी चर्चों और ईसाई बस्तियों को निशाना बनाया जाता है।
मानवता के माथे पर एक और बड़ा कलंक है यह शर्मनाक घटना
पाकिस्तान के इस सुदूर गांव में घटी यह घटना एक बार फिर पूरी सभ्य दुनिया के माथे पर बड़ा कलंक बन कर उभरी है। एक तरफ जहां दुनिया 21वीं सदी में विज्ञान, तकनीक और अंतरिक्ष की ऊंचाइयों को छू रही है, वहीं पाकिस्तान जैसे मुल्कों में आज भी मध्ययुगीन बर्बरता और धार्मिक कट्टरता का खुला खेल खेला जा रहा है। जिन मासूमों को सिर्फ इसलिए अपना आशियाना खोना पड़ा क्योंकि वे बहुसंख्यक आबादी के धर्म से ताल्लुक नहीं रखते थे, उनका दर्द शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। वैश्विक मंचों पर मानवाधिकार की दुहाई देने वाले देशों को अब आगे आकर पाकिस्तान पर कड़ा दबाव बनाना चाहिए ताकि वहां के अल्पसंख्यकों को जीने का अधिकार मिल सके। जब तक दोषियों को सरेआम कड़ी से कड़ी सजा नहीं दी जाती, तब तक वहां मासूमों का यह लहू बहता रहेगा और मानवीय मूल्यों की इस तरह धज्जियां उड़ती रहेंगी।