कंगाल हो रहा ईरान, CENTCOM का दावा- 25 अरब डॉलर के तेल का नुकसान

कंगाल हो रहा ईरान, CENTCOM का दावा- 25 अरब डॉलर के तेल का नुकसान

मध्य एशिया और खाड़ी देशों के राजनीतिक गलियारों से इस वक्त की सबसे बड़ी और चौंकाने वाली अंतरराष्ट्रीय खबर सामने आ रही है। अमेरिकी सेना की सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने एक सनसनीखेज खुलासा करते हुए दावा किया है कि कड़े अमेरिकी नौसैनिक प्रतिबंधों और रणनीतिक घेराबंदी के चलते ईरान की अर्थव्यवस्था बुरी तरह चरमरा गई है और वह धीरे-धीरे दिवालिया होने की कगार पर पहुंच रहा है। सेंटकॉम के शीर्ष अधिकारियों के अनुसार, पिछले कुछ महीनों के दौरान कड़े समुद्री प्रतिबंधों के कारण ईरान को कच्चे तेल के निर्यात में लगभग 25 अरब डॉलर यानी भारतीय मुद्रा में दो लाख करोड़ रुपये से अधिक का भारी-भरकम नुकसान उठाना पड़ा है। कभी अपनी तेल संपदा के बल पर मध्य पूर्व में धौंस जमाने वाला ईरान आज भयंकर वित्तीय संकट से जूझ रहा है, जिसका सीधा असर उसकी सामरिक ताकत और इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) की गतिविधियों पर पड़ता हुआ साफ दिखाई दे रहा है। इस खुलासे के बाद से वैश्विक राजनीति में एक नया भूचाल आ गया है और दुनिया भर के रक्षा विश्लेषक इस बात का आकलन कर रहे हैं कि क्या ईरान अब अपने प्रॉक्सी संगठनों को फंड देने की स्थिति में भी नहीं बचा है। आइए जानते हैं कि इस सनसनीखेज रिपोर्ट के पीछे की पूरी सच्चाई क्या है और अमेरिकी कार्रवाई ने किस तरह तेहरान की नींद उड़ा दी है।

अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी और CENTCOM का बड़ा दावा: कैसे डूबा 25 अरब डॉलर का तेल

अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) की ओर से जारी किए गए आधिकारिक बयानों के मुताबिक, अमेरिकी और सहयोगी देशों की नौसेना ने फारस की खाड़ी और आसपास के समुद्री मार्गों पर एक ऐसा कड़ा पहरा बिठा दिया है जिसके कारण ईरान के समुद्री व्यापार की कमर टूट चुकी है। रिपोर्ट में बताया गया है कि इस प्रभावी नौसैनिक नाकेबंदी (Naval Blockade) की वजह से ईरान अपनी अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले कच्चे तेल का निर्यात खुले तौर पर नहीं कर पा रहा है। पिछले कुछ समय में ईरान को कुल मिलाकर 25 अरब डॉलर के क्रूड ऑयल के निर्यात का चूना लग चुका है। इसके साथ ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वित्तीय शिकंजा कसते हुए लगभग 350 मिलियन डॉलर की क्रिप्टोकरेंसी को भी अमेरिकी और संबंधित अधिकारियों द्वारा फ्रीज कर दिया गया है, जिसका इस्तेमाल यह तंत्र अवैध फंडिंग और हथियारों की खरीद-फरोख्त के लिए करता था। अमेरिकी सैन्य नेतृत्व का कहना है कि मानवीय सहायता को छोड़कर समुद्री मार्ग से होने वाले तमाम आयातों और निर्यातों पर लगभग पूरी तरह से रोक लग चुकी है, जिससे ईरानी हुकूमत के भीतर भयंकर खलबली मची हुई है।

IRGC और प्रॉक्सी संगठनों पर मंडराया वित्तीय संकट, सैनिकों को वेतन चुकाना भी हुआ मुश्किल

इस अभूतपूर्व आर्थिक तंगी का सबसे बुरा असर ईरान के सबसे ताकतवर सैन्य संगठन इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) और उसके द्वारा पाले-पोसे जाने वाले क्षेत्रीय प्रॉक्सी संगठनों पर पड़ रहा है। खुफिया रिपोर्टों से यह बात भी सामने आई है कि धन की भारी कमी के कारण अब IRGC और उससे जुड़े मिलिशिया समूहों के भीतर आंतरिक कलह और निराशा बढ़ने लगी है। स्थिति यहां तक पहुंच चुकी है कि विभिन्न मोर्चों पर तैनात लड़ाकों और कमांडरों को समय पर वेतन और अन्य वित्तीय सहायता नहीं मिल पा रही है, जिससे कई समूहों को मजबूरन अपने खर्चों में कटौती करनी पड़ रही है या वे पैसों के लिए तरस रहे हैं। पश्चिमी एशिया में अस्थिरता फैलाने वाले इन संगठनों को मिलने वाला नियमित फंड सूखने की कगार पर पहुंच चुका है, जिसके चलते उनकी मारक क्षमता और ऑपरेशनल गतिविधियों पर बहुत बुरा असर पड़ा है। विश्लेषकों का मानना है कि यदि यही स्थिति कुछ समय और बनी रही, तो ईरान के लिए अपने इन छद्म युद्धों को लंबे समय तक जारी रखना लगभग असंभव हो जाएगा।

वैश्विक अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर पड़ने वाले इसके दूरगामी प्रभाव

ईरान के भीतर मचे इस आर्थिकहाहाकार और अमेरिकी सैन्य तंत्र के इस दबाव का असर केवल तेहरान की सीमाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके भू-राजनीतिक परिणाम पूरी दुनिया पर पड़ रहे हैं। एक तरफ जहां अमेरिका और उसके पश्चिमी सहयोगी इसे अपनी बड़ी कूटनीतिक और सामरिक जीत मान रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ क्षेत्रीय शांति के लिहाज से यह दौर बेहद संवेदनशील बना हुआ है। जानकारों का कहना है कि जब कोई देश आर्थिक मोर्चे पर पूरी तरह घिर जाता है और उसकी हुकूमत के पास वित्तीय संसाधन खत्म होने लगते हैं, तो वह और अधिक आक्रामक या अप्रत्याशित कदम उठा सकता है। यही वजह है कि मध्य पूर्व में तैनात अमेरिकी और खाड़ी देशों के सुरक्षा बलों को हाई अलर्ट पर रखा गया है ताकि किसी भी आपात स्थिति से तुरंत निपटा जा सके। बहरहाल, 25 अरब डॉलर के तेल नुकसान और करोड़ों की क्रिप्टो संपत्ति के जब्तीकरण ने यह साबित कर दिया है कि आधुनिक युद्धों में केवल हथियारों की ही नहीं, बल्कि वित्तीय नाकेबंदी की ताकत भी किसी देश को घुटने टेकने पर मजबूर कर सकती है।