विदेशी कंपनियों को अपनी जमीन नीलाम करेंगे शहबाज शरीफ और असीम मुनीर, जानें तंगहाली का पूरा सच!
गंभीर आर्थिक तंगी और भारी विदेशी कर्ज के बोझ तले दबे पाकिस्तान से एक बेहद हैरान करने वाली और बड़ी अंतरराष्ट्रीय खबर सामने आ रही है। देश को कंगाली और दिवालिया होने की कगार से बचाने के लिए पाकिस्तान की शहबाज शरीफ सरकार और सेना प्रमुख जनरल असिम मुनीर की जोड़ी ने एक बेहद विवादास्पद और बड़ा कदम उठाने का फैसला किया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, पाकिस्तान अपनी जमीन के नीचे दबे अरबों डॉलर के बेशकीमती खनिजों जैसे सोना, तांबा और अन्य दुर्लभ प्राकृतिक संसाधनों को विदेशी कंपनियों को नीलाम करने के लिए पूरी तरह बेताब नजर आ रहा है। इसके लिए विदेशी निवेश आकर्षित करने के नाम पर मुल्क के प्राकृतिक खजाने का सौदा करने की पूरी तैयारी कर ली गई है। सरकार के इस कदम ने न केवल पाकिस्तान के भीतर बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी भारी बहस और खलबली पैदा कर दी है।
कंगाली की कगार पर पाकिस्तान: आखिर क्यों बेचना पड़ रहा है देश का सोना और तांबा?
पाकिस्तान पिछले कुछ वर्षों से अपने इतिहास के सबसे बुरे आर्थिक दौर से गुजर रहा है। विदेशी मुद्रा भंडार में लगातार गिरावट, आसमान छूती महंगाई, बिजली-पानी का विकराल संकट और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के कड़े नियमों ने देश की अर्थव्यवस्था की कमर तोड़कर रख दी है। मित्र देशों जैसे चीन, सऊदी अरब और यूएई से लगातार कर्ज मांगने के बावजूद पाकिस्तान की वित्तीय स्थिति में कोई खास सुधार नहीं हो रहा है। हर महीने अरबों डॉलर के विदेशी कर्ज की किश्तें चुकाने के लिए देश के पास पर्याप्त संसाधन नहीं बचे हैं। इसी लाचारी और कंगाली के चलते प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और पाकिस्तानी सेनापति जनरल असिम मुनीर की जोड़ी ने अपनी धरती के भीतर छिपे प्राकृतिक खजानों को बेचकर तुरंत नकदी हासिल करने का यह अभूतपूर्व फैसला लिया है।
बलूचिस्तान का रिको डिक प्रोजेक्ट और विदेशी कंपनियों को जमीन नीलाम करने की होड़
पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में स्थित 'रिको डिक' (Reko Diq) का इलाका दुनिया के सबसे बड़े अप्रयुक्त तांबे और सोने के भंडारों में से एक माना जाता है। इस क्षेत्र में अरबों-खरबों डॉलर का सोना और तांबा मौजूद है। शहबाज सरकार की योजना है कि एसआईएफसी (Special Investment Facilitation Council) के जरिए बहुराष्ट्रीय कंपनियों को इस इलाके में खनन के अधिकार सौंपे जाएं और जमीन की नीलामी की जाए। इसके लिए अमेरिका, कनाडा, चीन और खाड़ी देशों की बड़ी-बड़ी खनन कंपनियों से बातचीत अंतिम चरणों में है। सरकार का तर्क है कि विदेशी निवेश आने से मुल्क को अरबों डॉलर का राजस्व मिलेगा और देश के विदेशी मुद्रा भंडार को सहारा मिल सकेगा।
असीम मुनीर का बढ़ा हस्तक्षेप और पाकिस्तानी जनता में भारी नाराजगी
इस पूरी नीलामी और सौदेबाजी में पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल असिम मुनीर की भूमिका सबसे अहम मानी जा रही है। पाकिस्तान में पारंपरिक रूप से सरकारें भले ही असैन्य नेताओं की हों, लेकिन वित्तीय और सुरक्षा से जुड़े बड़े फैसलों की कमान हमेशा रावलपिंडी (सैन्य मुख्यालय) के हाथ में ही रहती है। हालांकि, देश की जमीन और राष्ट्रीय संपत्तियों को विदेशी हाथों में बेचे जाने की इस कवायद से स्थानीय लोगों, विपक्षी राजनीतिक दलों और बलूच राष्ट्रवादियों में भारी गुस्सा व्याप्त है। बलूचिस्तान के स्थानीय निवासियों का आरोप है कि इस्लामाबाद और सैन्य प्रतिष्ठान उनकी जमीन के संसाधनों को लूटकर विदेशी शक्तियों को सौंप रहे हैं, जिससे वहां के मूल निवासियों को कोई आर्थिक लाभ नहीं मिलने वाला है।
बलूच विद्रोहियों की चेतावनी और सुरक्षा की सबसे बड़ी चुनौती
प्राकृतिक संसाधनों की इस संभावित नीलामी के सामने सबसे बड़ी बाधा सुरक्षा की स्थिति बनी हुई है। बलूचिस्तान में सक्रिय विभिन्न अलगाववादी और विद्रोही संगठन जैसे बलूच लिबरेशन आर्मी (BLA) लंबे समय से अपने प्राकृतिक संसाधनों के दोहन का विरोध करते आ रहे हैं। बलूच संगठनों ने साफ चेतावनी दी है कि वे अपनी सरजमीं पर किसी भी विदेशी कंपनी को अवैध खनन नहीं करने देंगे। इससे पहले भी बलूचिस्तान में चीनी इंजीनियरों और विकास परियोजनाओं पर कई घातक आत्मघाती हमले हो चुके हैं। ऐसे में अगर विदेशी कंपनियां यहां दांव लगाती भी हैं, तो उन्हें बेहद खौफनाक और अस्थिर सुरक्षा माहौल का सामना करना पड़ेगा, जिसे संभालना पाकिस्तानी सेना के लिए भी आसान नहीं होगा।
आर्थिक विशेषज्ञ क्या कहते हैं: क्या इस सौदे से सुधरेगी पाकिस्तान की तकदीर?
वैश्विक आर्थिक और रणनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आपातकालीन स्थिति में अपने प्राकृतिक संसाधनों को इस तरह हड़बड़ी में नीलाम करना देश के दीर्घकालिक हितों के खिलाफ साबित हो सकता है। यदि विदेशी कंपनियों को मनमाने तरीके से रियायतें दी गईं, तो पाकिस्तान को केवल मामूली रॉयल्टी ही मिल पाएगी, जबकि असली मुनाफा विदेशी ठेकेदार ले जाएंगे। इसके अलावा, संस्थागत सुधारों और भ्रष्टाचार पर लगाम लगाए बिना केवल सोना-तांबा बेच देने से पाकिस्तान का स्थाई आर्थिक संकट खत्म नहीं हो सकता। आने वाले समय में यह देखना होगा कि शहबाज-मुनीर की यह रणनीति पाकिस्तान को मंदी के दलदल से बाहर निकालती है या फिर देश को एक नए गृहयुद्ध और कूटनीतिक संकट की ओर धकेल देती है।