लाहौर में यौन हिंसा का खौफनाक आंकड़ा! 8 महीने में 498 रेप, 36 गैंगरेप और 1108 यौन अपराध
पड़ोसी देश पाकिस्तान से लगातार सामने आने वाली दिल दहला देने वाली खबरें मानवता को अंदर से झकझोर कर रख रही हैं। एक तरफ जहां पाकिस्तान अपनी संस्कृति और तहजीब के बड़े-बड़े दावे करता है, वहीं दूसरी तरफ उसके सबसे प्रमुख और बड़े शहरों में से एक लाहौर की जमीनी हकीकत बेहद भयानक और खौफनाक तस्वीर पेश कर रही है। लाहौर शहर से जो आंकड़े सामने आए हैं, उन्होंने कानून व्यवस्था, पुलिस की कार्यप्रणाली और समाज की मानसिकता पर कई गंभीर और बड़े सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं। हाल ही में जारी किए गए आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, इस महानगर में महिलाओं और बच्चियों के खिलाफ यौन हिंसा के मामलों में बेतहाशा बढ़ोतरी दर्ज की गई है। शहर की गलियों, घरों और सार्वजनिक स्थलों पर महिलाओं का जीवन कितना असुरक्षित हो चुका है, इसका अंदाजा इन डरावने और चौंकाने वाले आंकड़ों को देखकर आसानी से लगाया जा सकता है, जिन्हें सुनकर किसी भी संवेदनशील इंसान की रूह कांप उठेगी।
महज आठ महीनों में सामने आए 498 बलात्कार और 36 सामूहिक दुष्कर्म के मामले
लाहौर से सामने आए क्राइम डेटा के मुताबिक, साल के शुरुआती महज आठ महीनों के छोटे से अंतराल में ही यौन हिंसा के मामलों ने सारे पिछले रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। इन आठ महीनों के भीतर पुलिस थानों में दर्ज रिपोर्टों के अनुसार कुल 498 महिलाओं के साथ बलात्कार जैसी जघन्य और अमानवीय वारदातों को अंजाम दिया गया है। सिर्फ यही नहीं, बल्कि हैवानियत की सभी सीमाओं को पार करते हुए इसी अवधि में 36 सामूहिक दुष्कर्म यानी गैंगरेप की घटनाएं भी रिकॉर्ड की गई हैं। सोचिए, एक आधुनिक और बड़े शहर में यदि महज आठ महीनों के भीतर सैकड़ों महिलाओं को इस तरह की क्रूरता का सामना करना पड़े, तो वहां कानून का खौफ किस हद तक समाप्त हो चुका है। इन आंकड़ों में वे मामले भी शामिल हैं जो किसी तरह पुलिस तक पहुंच पाए, जबकि समाज के डर, सामाजिक प्रतिष्ठा और धमकियों के कारण अनगिनत मामले तो थानों की चौखट तक पहुंच ही नहीं पाते हैं, जिससे यह साफ जाहिर होता है कि वास्तविक आंकड़ा इससे कहीं अधिक बड़ा और भयानक हो सकता है।
कुल 1108 यौन अपराधों से दहला महानगर, सुरक्षित नहीं बचीं मासूम बेटियां
यदि केवल बलात्कार और गैंगरेप तक ही इस हिंसा का दायरा सीमित रहता तो भी स्थिति गंभीर थी, लेकिन आंकड़ों का पिटारा खोलने पर पता चलता है कि कुल यौन अपराधों की संख्या तो 1108 के आंकड़े को पार कर चुकी है। इसमें महिलाओं और बच्चियों के साथ छेड़छाड़, उत्पीड़न, अपहरण की कोशिशें और अन्य गंभीर यौन उत्पीड़न के मामले शामिल हैं। लाहौर की सड़कों पर अबलाओं का सुरक्षित चलना दूभर हो गया है। आंकड़े यह भी बताते हैं कि अपराधियों में अब कानून या पुलिस का कोई डर या खौफ बाकी नहीं बचा है। वे दिन हो या रात, बिना किसी डर के मासूमों और युवतियों को अपना शिकार बना रहे हैं। बच्चों से लेकर बुजुर्ग महिलाओं तक को इन दरिंदों ने नहीं छोड़ा है। इस तरह के बढ़ते अपराधों ने लाहौर के आम नागरिकों, खासकर अभिभावकों के दिलों में एक गहरा खौफ पैदा कर दिया है, जो हर पल अपनी बेटियों की सुरक्षा को लेकर चिंतित रहते हैं।
पुलिस प्रशासन और कानून व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर खड़े हुए बड़े सवाल
इन तमाम खौफनाक आंकड़ों के सामने आने के बाद सबसे बड़ा सवाल पाकिस्तान की पुलिस और वहां की न्याय व्यवस्था की नाकामी पर उठता है। आखिर क्या वजह है कि एक बड़े महानगर में जहां पुलिस बल और प्रशासनिक अमला हर कोने में तैनात होने का दावा करता है, वहां अपराधियों के हौसले इतने बुलंद हैं? जानकारों का मानना है कि पुलिस की लचर कार्यप्रणाली, मामलों में समय पर चार्जशीट दाखिल न होना, गवाहों पर दबाव और अदालतों में मुकदमों का सालों-साल चलना अपराधियों को खुली छूट दे देता है। कई मामलों में तो प्रभावशाली लोगों के शामिल होने के कारण पुलिस आरोपियों को बचाने का प्रयास करती है, जिससे अपराधियों के भीतर कानून का डर पूरी तरह से खत्म हो चुका है। जब तक पुलिस और न्याय व्यवस्था सख्त कदम उठाकर अपराधियों को त्वरित और कड़ी सजा नहीं देगी, तब तक इस तरह के खूनी और अमानवीय आंकड़ों पर लगाम लगाना नामुमकिन सा प्रतीत होता है।
समाज की दबी हुई आवाज और पीड़िताओं के सामने खड़ा न्याय का संघर्ष
पाकिस्तान जैसे पितृसत्तात्मक और रूढ़िवादी समाज में यौन हिंसा की शिकार होने वाली महिलाओं के सामने दोहरी चुनौती होती है। एक तरफ उन्हें उस भयानक शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना से जूझना पड़ता है, तो दूसरी तरफ समाज के तानों, बदनामी के डर और पारिवारिक दबाव का सामना करना पड़ता है। कई बार पीड़ित परिवार इज्जत के डर से पुलिस में शिकायत तक दर्ज नहीं कराते, जिसका फायदा उठाकर अपराधी खुलेआम घूमते रहते हैं। लाहौर में सामने आए ये 1108 यौन अपराध इस बात का प्रमाण हैं कि महिलाओं के प्रति सामाजिक दृष्टिकोण और सुरक्षा के मोर्चे पर अभी बहुत लंबा रास्ता तय करना बाकी है। मानवाधिकार संगठनों और महिला अधिकार कार्यकर्ताओं ने इन आंकड़ों के सामने आने के बाद सरकार से कड़े कानून बनाने और उनका सख्ती से पालन कराने की पुरजोर मांग की है, ताकि महिलाओं को एक सुरक्षित माहौल मिल सके।
कब रुकेगा यह खूनी खेल? क्या सरकार और प्रशासन ले पाएंगे कोई ठोस सबक
लाहौर के इन दिल दहला देने वाले आंकड़ों ने पूरी दुनिया का ध्यान इस ओर आकर्षित किया है कि दक्षिण एशिया के इस हिस्से में महिलाओं की स्थिति कितनी दयनीय होती जा रही है। हर नए महीने के साथ बढ़ते इन अपराधों के ग्राफ ने यह साबित कर दिया है कि केवल कागजी वादों और खोखले सुरक्षा दावों से महिलाओं की रक्षा नहीं की जा सकती। इसके लिए जमीनी स्तर पर पुलिस गश्त बढ़ानी होगी, नाइट पेट्रोलिंग को चुस्त करना होगा और अदालतों में फास्ट ट्रैक कोर्ट के जरिए अपराधियों को फांसी या उम्रकैद की सजा सुनिश्चित करनी होगी। जब तक अपराधियों के मन में कानून का खौफ पैदा नहीं होगा, तब तक लाहौर की गलियों से ऐसी वीभत्स और शर्मनाक खबरें आना बंद नहीं होंगी। यह वक्त है कि वहां के हुक्मरान अपनी राजनीति और कमियों को छोड़कर इन गंभीर मुद्दों पर कड़े से कड़ा फैसला लें ताकि भविष्य में किसी अन्य बेटी को इस नरक जैसी यातना से न गुजरना पड़े।