दो साल में ही टूटा ट्रंप का तिलिस्म: मिडटर्म चुनाव में रिपब्लिकन की करारी हार के 3 बड़े कारण
व्हाइट हाउस में ऐतिहासिक वापसी करने के महज दो साल के भीतर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को देश की जनता ने मध्यावधि चुनावों (मिडटर्म इलेक्शन) में अब तक का सबसे तगड़ा झटका दे दिया है।
ट्रंप भले ही राष्ट्रपति पद पर काबिज रहें, लेकिन अमेरिकी संसद के दोनों सदनों—सीनेट और हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स—में उनकी रिपब्लिकन पार्टी ने अपना बहुमत गंवा दिया है। उपराष्ट्रपति जेडी वेंस की स्वीकारोक्ति और राजनीतिक विश्लेषकों के आकलन के अनुसार, जिन कोर समर्थकों ने बाइडेन की नीतियों से त्रस्त होकर ट्रंप को सत्ता तक पहुंचाया था, वे उनके वादों की विफलता से तेजी से दूर छिटक गए। यूक्रेन युद्ध रुकवाने, विदेशी संघर्षों से अमेरिका को दूर रखने और महंगाई घटाने के वादों पर सवार होकर सत्ता में आए ट्रंप अपने ही फैसलों के ऐसे चक्रव्यूह में उलझे कि चुनावी मैदान में जनता ने रिपब्लिकन पार्टी को नकार दिया।
ये दांव पड़ गया उल्टा
इस सियासी हार की सबसे पहली और बड़ी वजह बना ट्रंप का ईरान के साथ सीधे युद्ध में कूदना। 'अमेरिका फर्स्ट' और विदेशी लड़ाइयों से दूर रहने का नारा देने वाले ट्रंप ने फरवरी में जब ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई शुरू की, तो दावा किया गया था कि यह जंग कुछ ही दिनों या हफ्तों में सिमट जाएगी। लेकिन यह दांव उल्टा पड़ गया और ईरान में सत्ता परिवर्तन होना तो दूर, उलटे ईरान ने रणनीतिक रूप से बेहद अहम होर्मुज जलडमरूमध्य पर अपनी पकड़ मजबूत कर ली। अमेरिकी सेना आठ महीने से जारी इस संघर्ष में ऐसी फंसी कि ट्रंप प्रशासन के लिए न तो पीछे हटना मुमकिन रहा और न ही आगे बढ़ना। ट्रंप के पारंपरिक समर्थक भी सवाल उठाने लगे कि जब यह विवाद इजरायल से जुड़ा था, तो अमेरिका को तीसरे देश की लड़ाई में अपने संसाधन और सैनिक झोंकने की क्या जरूरत थी, जिसने सीधे तौर पर ट्रंप के शांति वाले चुनावी वादे की हवा निकाल दी।
हार का दूसरा बड़ा कारण रहा आर्थिक मोर्चे पर भड़की बेकाबू महंगाई, जिसने सीधे अमेरिकी परिवारों के बजट को तबाह कर दिया। बाइडेन सरकार पर अर्थव्यवस्था बिगाड़ने का आरोप लगाकर सत्ता में आए ट्रंप ने घरेलू उद्योगों को बढ़ावा देने के नाम पर विदेशी उत्पादों पर ताबड़तोड़ टैरिफ लगा दिए। लेकिन इन शुल्कों का अंतिम भार अमेरिकी आयातकों और आम उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ा। रही-सही कसर होर्मुज संकट के चलते पेट्रोल-डीजल और ऊर्जा की कीमतों में आए जबर्दस्त उछाल ने पूरी कर दी। रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करने के लिए जूझ रहे मध्यमवर्गीय मतदाताओं का धैर्य जवाब दे गया। इसके साथ ही इमिग्रेशन पर चले आक्रामक अभियानों, न्यायपालिका व प्रशासनिक संस्थाओं के साथ लगातार टकराव और अपनी ही जनता के रोजमर्रा के मुद्दों को छोड़कर सिर्फ सियासी लड़ाइयों पर ध्यान केंद्रित करने की छवि ने जनता के असंतोष को वोटों की चोट में बदल दिया।