यूएस मिडटर्म में ट्रंप की हार का भारत पर क्या होगा असर; क्रूड ऑयल, H-1B वीजा और ट्रेड डील का पूरा गणित समझें
अमेरिका में मध्यावधि चुनावों (मिडटर्म इलेक्शन) के नतीजों ने वाशिंगटन के राजनीतिक शक्ति संतुलन को बदल दिया है, जिसका सीधा प्रभाव अब भारत सहित वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ता दिख रहा है। प्रतिनिधि सभा में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी के पिछड़ने के बाद उनके आक्रामक रणनीतिक एजेंडे पर अमेरिकी संसद (कांग्रेस) की निगरानी कड़ी होना तय माना जा रहा है। मध्य पूर्व में ईरान के साथ सैन्य तनाव, कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतें, भारत-अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार वार्ता, H-1B वीजा नीति और भारतीय शेयर बाजार पर इन बदले समीकरणों का मिला-जुला प्रभाव देखने को मिल सकता है।
भारत के लिए सबसे बड़ा और फौरी आर्थिक लाभ ऊर्जा बाजार से मिलने की उम्मीद है। चुनाव नतीजों के बाद भारी सैन्य बजट और महंगे कच्चे तेल के चलते ट्रंप प्रशासन पर ईरान के खिलाफ आक्रामक रुख को धीमा करने का चौतरफा दबाव बढ़ेगा। यदि मध्य पूर्व में सैन्य तनाव घटता है या कूटनीतिक समाधान निकलता है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमतों में नरमी आएगी। चूंकि भारत अपनी कुल ईंधन खपत का 85 फीसदी से अधिक हिस्सा आयात करता है, इसलिए कच्चे तेल के दाम गिरने से भारतीय ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) का आयात बिल घटेगा। इससे घरेलू स्तर पर पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में राहत मिलने के साथ-साथ देश का चालू खाता घाटा भी नियंत्रित रहेगा।
भारत-अमेरिका ट्रेड डील पूरी तरह रद्द होने की संभावना न के बराबर
रणनीतिक व्यापार वार्ताओं की बात करें तो भारत-अमेरिका ट्रेड डील पूरी तरह रद्द होने की संभावना न के बराबर है, क्योंकि अमेरिका में दोनों ही प्रमुख दल (डेमोक्रेट्स और रिपब्लिकन) भारत के साथ रणनीतिक साझेदारी मजबूत रखने के पक्षधर हैं। हालांकि, प्रतिनिधि सभा में डेमोक्रेट्स का दबदबा बढ़ने से टैरिफ, मैन्युफैक्चरिंग, ऊर्जा और निवेश से जुड़े प्रावधानों की बारीकी से जांच हो सकती है। डेमोक्रेटिक सांसद राष्ट्रपति के एकतरफा टैरिफ लगाने के अधिकारों की समीक्षा की मांग उठा सकते हैं। चूंकि अमेरिकी राष्ट्रपति के पास टैरिफ पर स्वतंत्र अधिकार और संसदीय कानूनों पर वीटो पावर मौजूद है, इसलिए रातों-रात अमेरिकी विदेश व्यापार नीति में कोई बड़ा उलटफेर नहीं होगा, पर वार्ताओं में कुछ समय के लिए ठहराव जरूर आ सकता है।
भारतीय आईटी सेक्टर और प्रोफेशनल्स के लिए H-1B वीजा का मुद्दा सबसे अहम बना हुआ है। राष्ट्रपति ट्रंप ने नए H-1B आवेदनों पर 100,000 डॉलर तक की भारी फीस लगाने जैसा कठोर प्रस्ताव रखा था, जिसका सबसे बड़ा झटका भारतीय पेशेवरों पर पड़ना तय था, क्योंकि कुल स्वीकृत H-1B वीजा में लगभग 70 फीसदी हिस्सेदारी भारतीयों की रही है। अब संसद में संतुलन बदलने के बाद इस तरह के अत्यधिक कड़े आव्रजन प्रस्तावों पर संसदीय जांच बढ़ेगी और इनके सीधे कानून बनने की राह में रुकावट आएगी। हालांकि आव्रजन कानूनों की सामान्य प्रशासनिक निगरानी सख्त रहेगी, लेकिन एकतरफा कठोर फैसलों पर ब्रेक लगने से भारतीय तकनीकी विशेषज्ञों को तात्कालिक राहत मिल सकती है।
कूटनीतिक मोर्चे पर, डेमोक्रेटिक सांसद ट्रंप प्रशासन और पाकिस्तान के बीच वित्तीय व रणनीतिक संपर्कों की पड़ताल तेज कर सकते हैं। खासतौर पर क्रिप्टोकरेंसी क्षेत्र में पाकिस्तान की भूमिका और ट्रंप परिवार (जेरेड कुशनर, एरिक व डोनाल्ड जूनियर) की 60 फीसदी हिस्सेदारी वाली कंपनियों के पाकिस्तान क्रिप्टो काउंसिल के साथ कथित समझौतों पर अमेरिकी संसद में सवाल उठ सकते हैं। भारत के लिए यह कूटनीतिक रूप से महत्वपूर्ण साबित होगा। वहीं घरेलू शेयर बाजार की बात करें तो भारतीय बाजारों को मजबूत मैक्रो इकोनॉमिक फंडामेंटल्स और एफआईआई (FII) प्रवाह का समर्थन हासिल है। आगामी दिनों में डॉलर इंडेक्स की चाल, वैश्विक लिक्विडिटी और सस्ते कच्चे तेल के संकेत दलाल स्ट्रीट के लिए सकारात्मक उत्प्रेरक का काम कर सकते हैं।