430 साल पुराना रहस्यमयी मंदिर! जहां खूंखार डकैतों ने शुरू की थी पूजा, अंग्रेज अफसर भी टेकते थे माथा

430 साल पुराना रहस्यमयी मंदिर! जहां खूंखार डकैतों ने शुरू की थी पूजा, अंग्रेज अफसर भी टेकते थे माथा

पश्चिम बंगाल के पश्चिम मेदिनीपुर जिले के घाटाल में आस्था, इतिहास और लोकविश्वास का अनूठा संगम देखने को मिलता है। विद्यासागर स्कूल के उत्तर में स्थित मां मुक्तकेशी काली मंदिर क्षेत्र के सबसे प्राचीन और रहस्यमयी तीर्थों में गिना जाता है। करीब 430 साल पुराने इस पावन स्थल से जुड़ी लोककथाएं आज भी लोगों को रोमांचित कर देती हैं। 

क्या है मान्यता

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, जब यह पूरा क्षेत्र घने जंगलों, बीहड़ों और दलदली जलभूमियों से घिरा हुआ था और आवागमन का एकमात्र जरिया शिलाबती नदी का जलमार्ग था, तब बंगाली संवत 1011 में डकैतों के एक गिरोह ने एक विशाल वटवृक्ष की छांव में मां मुक्तकेशी की स्थापना कर नियमित पूजा शुरू की थी। वक्त बीतने के साथ बीहड़ खत्म हुए और आधुनिक बस्तियां बस गईं, लेकिन मां के प्रति जनमानस की अगाध आस्था जस की तस बनी हुई है।

मंदिर की स्थापना को लेकर एक अन्य बेहद पवित्र पारिवारिक परंपरा भी जुड़ी है। कहा जाता है कि चक्रवर्ती परिवार के एक पूर्वज को मां काली ने स्वप्न में साक्षात दर्शन देकर कसौटी पत्थर से बनी प्रतिमा स्थापित करने का आदेश दिया था। इसके बाद वे दक्षिणेश्वर के जंगलों से कसौटी पत्थर की दुर्लभ मूर्ति लेकर घाटाल पहुंचे और वैदिक रीति से उसकी प्राण-प्रतिष्ठा कराई। तभी से चक्रवर्ती परिवार पूरी निष्ठा के साथ इस मंदिर की सेवा और संरक्षण की जिम्मेदारी निभा रहा है। अंग्रेजी हुकूमत के दौर में भी इस मंदिर की ख्याति इतनी फैली थी कि कई अंग्रेज अफसर भी मां के दर्शन और आशीर्वाद के लिए यहां पहुंचते थे, जिसके किस्से आज भी स्थानीय समाज में सुनाए जाते हैं।

वर्तमान में चक्रवर्ती परिवार के सानिध्य में मां मुक्तकेशी की आराधना 'दक्षिणा काली' के भव्य स्वरूप में की जाती है। विशेष रूप से दीपावली की महानिशीथ काल वाली काली पूजा के दिन यहां सदियों पुराने तांत्रिक और पारंपरिक विधान संपन्न किए जाते हैं, जिसमें कुल परंपरा के तहत तीन बकरों की बलि अर्पित की जाती है। 

सबसे अनूठी परंपरा मां को लगाए जाने वाले पारंपरिक महाभोग की है, जिसमें छह अलग-अलग प्रकार की कद्दू की विशेष सब्जियां, तली हुई ताजी मछली और बंगाल के पारंपरिक पकवान श्रद्धापूर्वक अर्पित किए जाते हैं। स्थानीय निवासी अनंत नाग बताते हैं कि चार शताब्दियां बीत जाने के बाद भी पूजा के मूल स्वरूप और नियमों में रत्ती भर भी बदलाव नहीं आया है। यह मंदिर आज न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि मेदिनीपुर के 400 साल पुराने सामाजिक और सांस्कृतिक इतिहास की जीती-जागती गवाही भी देता है।