दशहरा पर पुतला जलाने से पहले जान लें रावण की ये 3 सीख, मरते वक्त लक्ष्मण को बताया था सफलता का बड़ा रहस्य

दशहरा पर पुतला जलाने से पहले जान लें रावण की ये 3 सीख, मरते वक्त लक्ष्मण को बताया था सफलता का बड़ा रहस्य

"जो रावण को अपने मन से निकाल देता है, उसे अपने भीतर ही राम का वास मिलता है..." फिल्म 'स्वदेश' के गीत की यह कालजयी पंक्ति हर साल विजयादशमी के पावन अवसर पर अंतर्मन को झकझोर देती है। 20 अक्टूबर को पूरे देश में विजयादशमी यानी दशहरा का पर्व रावण के प्रतीकात्मक पुतले का दहन कर धूमधाम से मनाया जाएगा, लेकिन यह दिन केवल आतिशबाजी और बाहरी पुतलों को जलाने का नहीं, बल्कि अपने भीतर पनप रहे अहंकार, लालच और दुर्गुणों के रावण को भस्म करने का संकल्प लेने का है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, नवरात्रि में मां भगवती की उपासना के बाद प्रभु श्रीराम ने रावण की आसुरी सेना को परास्त कर धर्म और न्याय के 'रामराज्य' की नींव रखी थी। युद्धभूमि में जब दशानन मृत्युशैया पर था, तब प्रभु श्रीराम और लक्ष्मण के बीच का एक दुर्लभ संवाद जीवन प्रबंधन का सबसे बड़ा सबक बन गया।

युद्ध समाप्त होते ही जहां रावण की सेना तितर-बितर हो गई, वहीं रावण को रणभूमि में अंतिम सांसें लेते देख लक्ष्मण के भीतर का क्रोध शांत नहीं हो रहा था। तभी एक अप्रत्याशित दृश्य दिखा—मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने शांत भाव से हाथ जोड़कर मरणासन्न रावण को नमन किया। लक्ष्मण ने आश्चर्यचकित होकर पूछा कि इतना कष्ट देने वाले दुष्ट के आगे वे हाथ क्यों जोड़ रहे हैं, तो प्रभु श्रीराम ने मुस्कुराते हुए कहा कि मृत्यु के साथ ही सारी शत्रुता समाप्त हो जाती है। श्रीराम ने समझाया कि रावण अपने कर्मों का फल पा चुका है, लेकिन उसकी प्रकांड विद्वता, वेदों के ज्ञान, नीतिशास्त्र और सामर्थ्य का सम्मान होना चाहिए। उन्होंने लक्ष्मण को निर्देश दिया कि वे अपना क्रोध त्यागकर रावण के चरणों के पास जाएं और इस महाविद्वान से जीवन का अंतिम ज्ञान प्राप्त करें।

लक्ष्मण को दिए रावण ने ये तीन जीवन-सबक

भगवान राम का आदेश पाकर लक्ष्मण ने विनम्रता से रावण के चरणों के समीप जाकर हाथ जोड़े और ज्ञान देने की प्रार्थना की। इस पर रावण ने मृत्यु से ठीक पहले लक्ष्मण को जीवन बदलने वाले तीन महत्वपूर्ण उपदेश दिए।

पहला उपदेश यह था कि 'शुभस्य शीघ्रम'—यानी किसी भी अच्छे या कल्याणकारी कार्य को करने में कभी टालमटोल या देरी नहीं करनी चाहिए। वहीं अगर मन किसी अनुचित या पापकर्म की ओर आकर्षित हो, तो उस क्षण कितना भी प्रलोभन क्यों न दिखे, उसे फौरन दृढ़ता से टाल देना चाहिए।

रावण ने दूसरी सीख यह दी कि कभी भी अपनी ताकत, ज्ञान और उपलब्धियों के घमंड में अंधा नहीं होना चाहिए। अत्यधिक अहंकार व्यक्ति के विवेक का हरण कर लेता है, जिससे वह दूसरों को तुच्छ समझने लगता है और यही पतन का सबसे बड़ा कारण बनता है।

तीसरी और सबसे कड़वी सीख गोपनीयता की थी—रावण ने बताया कि अपने जीवन के सबसे गहरे राज और कमजोरियां कभी किसी के साथ साझा नहीं करनी चाहिए, क्योंकि समय और परिस्थितियां बदलने पर कौन कब शत्रु बन जाए, कोई नहीं जानता; ठीक वैसे ही जैसे उसके अपने भाई विभीषण ने उसके प्राणों का भेद उजागर कर दिया।