भारत के खिलाफ अमेरिकी दांव पड़ा उल्टा: यूरोप ने छोड़ा साथ, कैपिटल हिल में ट्रंप के फैसले पर भारी बवाल

भारत के खिलाफ अमेरिकी दांव पड़ा उल्टा: यूरोप ने छोड़ा साथ, कैपिटल हिल में ट्रंप के फैसले पर भारी बवाल

रूस से रियायती दरों पर कच्चा तेल खरीद रहे भारत और चीन पर कड़े सेकेंडरी प्रतिबंध (Secondary Sanctions) थोपने की अमेरिकी कोशिशों को बड़ा कूटनीतिक झटका लगा है। यूरोपीय सहयोगियों द्वारा प्रतिबंधों का हिस्सा बनने से साफ इनकार करने के बाद डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन को अपने कदम पीछे खींचने पड़े हैं और इस कार्रवाई को 60 दिनों के लिए टाल दिया गया है। अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने एनबीसी न्यूज के कार्यक्रम 'मीट द प्रेस' में इस पूरे घटनाक्रम का खुलासा करते हुए यूरोपीय देशों के दोहरे रवैये पर तीखा हमला बोला। बेसेंट ने स्पष्ट कहा कि अमेरिका ने यूरोपीय साझेदारों से भारत और चीन पर मिलकर प्रतिबंध लगाने की अपील की थी, लेकिन उन्होंने इस प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया। ऐसे में अमेरिका अकेले इस फैसले का वैश्विक आर्थिक और भू-राजनीतिक नुकसान उठाने को तैयार नहीं है।

यूरोपीय देश रूस पर निर्भर क्यों

बेसेंट ने यूरोप पर सीधा हमला बोलते हुए आरोप लगाया कि यूरोपीय देश खुद अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए मॉस्को पर निर्भर हैं और मई महीने में ही उन्होंने रूसी डीजल व जेट ईंधन पर लगे प्रतिबंध चुपचाप हटा लिए थे। उन्होंने तीखे शब्दों में कहा कि यूरोप ने यूक्रेन को जितनी आर्थिक व सैन्य मदद नहीं दी, उससे दस गुना ज्यादा रकम रूसी ऊर्जा खरीदकर व्लादिमीर पुतिन के खजाने में डाल दी है। अमेरिकी अधिकारी के मुताबिक, जहां अमेरिका रूस से मात्र 4 अरब डॉलर (जिसमें 1.8 अरब डॉलर का उर्वरक शामिल है) का आयात करता है, वहीं यूरोप आज भी रूसी तेल और गैस खरीदकर सीधे तौर पर रूस की युद्ध मशीन को फंड करने में जुटा है।

इस कूटनीतिक गतिरोध के बीच अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो और स्कॉट बेसेंट ने बताया कि राष्ट्रपति ट्रंप ने 'ग्राहम एक्ट' के तहत मिली शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए एक कार्यकारी आदेश जारी किया है, जिसके जरिए भारत और अन्य देशों पर लगने वाले अतिरिक्त शुल्कों और प्रतिबंधों को फिलहाल 60 दिनों के लिए स्थगित किया गया है। भारत और उज्बेकिस्तान की छह दिवसीय महत्वपूर्ण यात्रा पर रवाना होने से ठीक पहले पत्रकारों से बात करते हुए मार्को रुबियो ने साफ किया कि यह राहत अस्थायी है ताकि अमेरिकी और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर इसके प्रभाव की समीक्षा की जा सके। रुबियो ने रेखांकित किया कि ईरान से गहराते तनाव, सऊदी अरब पर हूती विद्रोहियों के हमलों और रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार पहले से ही भारी दबाव में है, ऐसे में तेल आपूर्ति में किसी भी नई रुकावट से वैश्विक संकट खड़ा हो सकता है।

दूसरी ओर, मार-ए-लागो रिसॉर्ट से राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने इस फैसले का बचाव करते हुए इसे दुनिया और अमेरिका दोनों के हित में बताया। हालांकि अमेरिकी संसद (कैपिटल हिल) में इस फैसले का चौतरफा विरोध शुरू हो गया है। रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक दोनों दलों के कई सांसदों ने ट्रंप के रुख पर सवाल उठाए हैं। प्रभावशाली भारतीय-अमेरिकी डेमोक्रेटिक सांसद अमी बेरा ने कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि प्रतिबंध टालने से पुतिन को खुली छूट मिल रही है और यूक्रेन को अधर में छोड़ दिया गया है। वहीं नवनिर्वाचित सांसद सुहास सुब्रमण्यम ने भी भारत और चीन के खिलाफ प्रतिबंधों पर नरमी बरतने को लेकर ट्रंप प्रशासन के फैसले पर तीखी नाराजगी दर्ज कराई है।