पंच से राजभवन तक का सफर! 74 की उम्र में उत्तराखंड के नए राज्यपाल बने डॉ. ढाल सिंह बिसेन, ली शपथ

पंच से राजभवन तक का सफर! 74 की उम्र में उत्तराखंड के नए राज्यपाल बने डॉ. ढाल सिंह बिसेन, ली शपथ

मध्य प्रदेश की सियासत में लंबा सियासी सफर तय करने वाले वरिष्ठ राजनेता और पूर्व सांसद डॉ. ढाल सिंह बिसेन ने उत्तराखंड के 9वें राज्यपाल के रूप में विधिवत कमान संभाल ली है।

देहरादून स्थित राजभवन (लोक भवन) के प्रांगण में आयोजित सादे एवं गरिमामय समारोह में उत्तराखंड उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ने उन्हें पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलाई। डॉ. बिसेन ने पूर्व राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह (सेवानिवृत्त) की जगह ली है। शपथ ग्रहण के तुरंत बाद नए राज्यपाल ने देवभूमि के चहुंमुखी विकास, जनकल्याण और लोकतांत्रिक व संवैधानिक मूल्यों की मजबूती के प्रति अपनी कटिबद्धता दोहराई। इस मौके पर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी, कैबिनेट मंत्री सतपाल महाराज, सुबोध उनियाल, डॉ. धन सिंह रावत, पूर्व मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत, पूर्व केंद्रीय मंत्री रमेश पोखरियाल 'निशंक' और वरिष्ठ विधायक मदन कौशिक समेत राज्य के कई गणमान्य लोग मौजूद रहे। 

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने उन्हें पुष्पगुच्छ भेंट कर बधाई दी और विश्वास जताया कि उनके दीर्घकालिक प्रशासनिक तजुर्बे का लाभ राज्य को मिलेगा।

राज्यपाल पद तक पहुंचने का संस्मरण साझा करते हुए 74 वर्षीय डॉ. बिसेन ने भावुक होते हुए बताया कि 12 अक्टूबर की शाम जब वे सिवनी स्थित अपने पैतृक आवास के लॉन में पोते के साथ टहल रहे थे, तभी अचानक भोपाल से आए एक फोन कॉल ने उन्हें यह सुखद सूचना दी कि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उन्हें उत्तराखंड का नया राज्यपाल नियुक्त किया है। यह खबर फैलते ही उनके घर पर समर्थकों और शुभचिंतकों का तांता लग गया और माहौल जश्न में बदल गया। राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त छह नए राज्यपालों की सूची में शामिल डॉ. बिसेन का जन्म 14 मई 1952 को मध्य प्रदेश के सिवनी जिले के पिपरिया गांव में हुआ था। उन्होंने राजनीति की शुरुआत जमीनी स्तर पर एक ग्राम पंचायत पंच के रूप में की थी और अपनी सादगी व जनसेवा के बूते वे सत्ता के शीर्ष पदों तक पहुंचे।

कुछ ऐसा रहा है राजनीतिक सफर

डॉ. बिसेन के पास पांच दशकों से अधिक का समृद्ध राजनीतिक और विधायी अनुभव है। उन्होंने सिवनी जिले की बरघाट विधानसभा सीट से भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर निरंतर चार बार—1990, 1993, 1998 और 2003—शानदार जीत दर्ज कर मध्य प्रदेश विधानसभा में अपनी मजबूत पहचान बनाई। बरघाट सीट के अनुसूचित जनजाति (ST) वर्ग के लिए आरक्षित होने के बाद उन्होंने केवलारी से 2008 और 2013 का विधानसभा चुनाव लड़ा। 

एमपी सरकार में 2003 से 2005 के दौरान उन्होंने वन, परिवहन और खनिज साधन जैसे अहम विभागों के कैबिनेट मंत्री के रूप में कार्य किया, जबकि बाद में उन्हें स्कूल शिक्षा और जेल विभाग की जिम्मेदारी सौंपी गई। 2011 से 2013 तक वे मध्य प्रदेश के चौथे राज्य वित्त आयोग के अध्यक्ष पद पर रहे। साल 2019 के आम चुनाव में भाजपा ने उन्हें बालाघाट लोकसभा क्षेत्र से उम्मीदवार बनाया, जहां भारी मतों से जीतकर वे 17वीं लोकसभा के सदस्य बने और 2024 तक संसद में क्षेत्र की आवाज उठाते रहे। वर्तमान में वे भाजपा की राज्य कार्य समिति के सक्रिय सदस्य के रूप में संगठन को अपनी सेवाएं दे रहे थे।