कौन हैं अजिंक्य शिंदे; IT जॉब छोड़ बने थे एक्टिविस्ट, अब संभालेंगे CJP के दिल्ली आंदोलन की कमान
राष्ट्रीय राजधानी के जंतर-मंतर पर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ मोर्चा खोलने वाली कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के शीर्ष नेताओं की गिरफ्तारी के बाद 35 वर्षीय अजिंक्य शिंदे अचानक सुर्खियों में आ गए हैं। पार्टी संस्थापक अभिजीत दिपके, सह-संयोजक सौरभ दास और आशुतोष रांका को शनिवार को बेंगलुरु से दिल्ली पहुंचते ही फ्लाइट के अंदर से हिरासत में ले लिया गया था। हिरासत में जाते ही दिपके ने एक वीडियो संदेश जारी कर आंदोलन के अगले चरण की पूरी कमान अजिंक्य शिंदे के हाथों में सौंपने का आधिकारिक ऐलान कर दिया। इसके साथ ही शिंदे अब जंतर-मंतर पर सीजेपी के इस हाई-प्रोफाइल विरोध प्रदर्शन के मुख्य रणनीतिकार और चेहरा बनकर उभरे हैं।
अजिंक्य शिंदे की काफी दिलचस्प रही
मूल रूप से महाराष्ट्र के धाराशिव जिले के उमरगा तालुका स्थित मुलाज गांव के रहने वाले अजिंक्य शिंदे की पृष्ठभूमि काफी दिलचस्प है। कम उम्र में पिता पांडुरंग के निधन के बाद वे अपनी मां तुलजा और बड़े भाई अमर (जो अब एमबीबीएस डॉक्टर हैं) के साथ लातूर आ गए थे। लातूर से स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद शिंदे ने कोंकण क्षेत्र से कंप्यूटर इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की और कुछ समय तक हॉस्पिटैलिटी सेक्टर और एक प्रतिष्ठित इंटरनेशनल आईटी फर्म में काम किया। हालांकि सामाजिक और राजनीतिक आंदोलनों के प्रति उनके गहरे रुझान ने उन्हें नौकरी छोड़ने पर मजबूर कर दिया। शिंदे ने आम आदमी पार्टी का पूर्णकालिक वॉलंटियर बनने के लिए अपनी कॉरपोरेट नौकरी को अलविदा कह दिया था। साल 2016 में वे आप के चुनावी अभियान के सिलसिले में लगभग एक साल तक गोवा में सक्रिय रहे और बाद में वे महाराष्ट्र में पार्टी की युवा शाखा के संयोजक भी बने।
मराठवाड़ा के पड़ोसी जिलों से ताल्लुक रखने के कारण अभिजीत दिपके और अजिंक्य शिंदे के बीच दिल्ली में आप संगठन के दिनों से ही मजबूत सियासी तालमेल रहा है। जब दिपके ने सीजेपी की नींव रखी, तो शिंदे शुरुआत से ही उनकी कोर टीम का अहम हिस्सा बन गए। शिंदे फिलहाल महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के अलीबाग में रहकर अपनी गतिविधियां संचालित करते हैं। सूत्रों के मुताबिक, दिल्ली में पुलिस की संभावित कार्रवाई को भांपते हुए एक सोची-समझी रणनीति के तहत शिंदे विरोध प्रदर्शन शुरू होने से तीन दिन पहले ही चुपचाप दिल्ली पहुंच गए थे, ताकि पुलिस की नजरों से बचकर ऐन वक्त पर जमीन पर कमान संभाली जा सके। लातूर पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार, साल 2020 में भी शिंदे पर निषेधाज्ञा उल्लंघन से संबंधित धाराओं में मामला दर्ज हो चुका है।