टिकट बंटवारे से पहले ही खिंच गईं तलवारें, जानिए बंद कमरों में अखिलेश और कांग्रेस के बीच क्या खिचड़ी पक रही
यूपी विधानसभा इलेक्शन में अब महज चार महीने का वक्त बचा है और विपक्षी खेमे में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी को घेरने की रणनीति अभी तक गठबंधन के पेच में उलझी हुई है। कांग्रेस संगठन में हाल ही में किए गए बड़े बदलाव के बाद समाजवादी पार्टी के साथ सीटों के तालमेल की राह और पेचीदा हो गई है।
नवनियुक्त प्रदेश अध्यक्ष अराधना मिश्रा 'मोना' जहां अखिलेश यादव की सपा के साथ मिलकर चुनाव मैदान में उतरने की प्रबल पैरोकार मानी जाती हैं, वहीं पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष और सहारनपुर से सांसद इमरान मसूद इस गठबंधन के सख्त खिलाफ हैं। नेतृत्व परिवर्तन के इस ताजा कदम के जरिए कांग्रेस अपने पुराने और दशकों तक मजबूत रहे 'ब्राह्मण-मुस्लिम-दलित' सोशल इंजीनियरिंग फॉर्मूले को फिर से जिंदा करने की कोशिश में जुटी है, लेकिन शीर्ष नेताओं के आपसी मतभेद ने इंडिया गठबंधन की सीट-शेयरिंग वार्ता पर सवालिया निशान लगा दिया है।
लगातार खिसकती रही है कांग्रेस की सियासी जमीन
उत्तर प्रदेश की सत्ता से दिसंबर 1989 में हटने के बाद से कांग्रेस की सियासी जमीन लगातार खिसकती रही है। मुलायम सिंह यादव के मुख्यमंत्री बनने के साथ ही राज्य में कांग्रेस के स्वर्णिम दौर का जो अंत हुआ, उसके बाद पार्टी कभी अपने पैरों पर खड़ी नहीं हो सकी। मंडल राजनीति के उभार, राम जन्मभूमि आंदोलन और सपा-बसपा जैसी क्षेत्रीय ताकतों के मजबूत होने से कांग्रेस का पारंपरिक वोट बैंक पूरी तरह बिखर गया। दलित मतदाता बसपा के पाले में चले गए, मुस्लिम सपा के साथ लामबंद हो गए और सवर्ण मतदाताओं ने भाजपा का रुख कर लिया। नतीजतन 1985 में 269 सीटें जीतने वाली कांग्रेस 1989 में 94 सीटों पर सिमटी और उसके बाद कभी वापसी नहीं कर पाई।
चुनावी आंकड़ों का इतिहास भी कांग्रेस के निरंतर ढलान की गवाही देता है। साल 1991 के विधानसभा इलेक्शन में पार्टी 413 सीटों पर लड़कर महज 46 सीटें और 17.32 प्रतिशत वोट पा सकी। 1993 में सपा-बसपा गठबंधन की लहर में पार्टी 28 सीटों पर सिमट गई, जबकि 1996 में बसपा के साथ गठबंधन करके 126 सीटों पर लड़ने के बावजूद सिर्फ 33 सीटें और 8.35 प्रतिशत वोट हासिल हुए। सोनिया गांधी के दौर में भी यह स्थिति नहीं सुधरी—2002 में 25, 2007 में 22 और 2012 में पार्टी 28 सीटों पर ही अटकी रही।
वर्ष 2017 में अखिलेश यादव और राहुल गांधी की जोड़ी के तहत हुआ गठबंधन भी बुरी तरह फ्लॉप रहा था। उस वक्त 105 सीटों के समझौते के बावजूद कांग्रेस ने 114 सीटों पर किस्मत आजमाई, लेकिन 6.25 फीसदी वोट शेयर के साथ केवल 7 सीटों पर सिमट गई। वहीं 2022 के विधानसभा इलेक्शन में प्रियंका गांधी के नेतृत्व में अकेले 399 सीटों पर लड़कर पार्टी अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई, जहां उसे 2.33 प्रतिशत वोट और सिर्फ 2 सीटें नसीब हुईं। अब जब एक बार फिर विधानसभा इलेक्शन मुहाने पर हैं, कमजोर संगठन और गठबंधन को लेकर पार्टी के भीतर खिंची तलवारें यह तय करेंगी कि कांग्रेस यूपी में अपनी खोई जमीन तलाश पाती है या भाजपा के सामने विपक्ष की राह और कठिन हो जाएगी।