चित्तौड़गढ़ के रावतभाटा डंपिंग यार्ड की डराने वाली तस्वीर
राजस्थान के चित्तौड़गढ़ जिले के अंतर्गत आने वाले महत्वपूर्ण औद्योगिक और परमाणु नगरी रावतभाटा से एक बेहद चिंताजनक, संवेदनशील और मानवीय संवेदनाओं को झकझोर देने वाली तस्वीर सामने आई है. शहर के मुख्य कचरा डंपिंग यार्ड की बदहाली अब इस हद तक बढ़ चुकी है कि यह क्षेत्र स्थानीय निवासियों और बेजुबान जानवरों के लिए एक नरक में तब्दील होता जा रहा है. खुले में फेंके गए भारी-भरकम कचरे और प्लास्टिक के अंबार के बीच बेसहारा गोवंश अपने भोजन की तलाश में प्लास्टिक और जहरीला कचरा खाने को मजबूर हैं, जिससे उनकी आंतें खराब हो रही हैं और वे अकाल मौत के मुंह में समा रहे हैं. दूसरी ओर, इस डंपिंग यार्ड में लगातार सुलगने वाले कचरे के ढेरों से निकलने वाला जहरीला काला धुआं आसपास की घनी बस्तियों में फैल रहा है, जिसके कारण स्थानीय नागरिकों का सांस लेना तक दूभर हो गया है. प्रशासन और नगर पालिका की इस घोर उदासीनता के कारण पर्यावरण सुरक्षा के तमाम नियम ताक पर रख दिए गए हैं, और लोग गंभीर बीमारियों की चपेट में आने लगे हैं. आइए विस्तार से जानते हैं रावतभाटा के इस बदहाल डंपिंग यार्ड की जमीनी हकीकत और इससे उत्पन्न हो रहे गंभीर खतरों के बारे में.
रावतभाटा डंपिंग यार्ड की बदहाली और नगर पालिका की आपराधिक लापरवाही
किसी भी शहर को स्वच्छ और सुंदर बनाए रखने की प्राथमिक जिम्मेदारी वहां के स्थानीय प्रशासन और नगर पालिका की होती है, लेकिन रावतभाटा में स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत नजर आती है. शहरभर से निकलने वाले ठोस कचरे, प्लास्टिक, बायो-मेडिकल वेस्ट और सड़े-गले पदार्थों को वैज्ञानिक तरीकों से प्रोसेस करने के बजाय सीधे एक खुले मैदान में यूं ही फेंक दिया जाता है, जो अब एक विशालकाय डंपिंग यार्ड का रूप ले चुका है. इस यार्ड के चारों तरफ न तो कोई चारदीवारी है और न ही कचरे के वैज्ञानिक निष्कासन की कोई उचित व्यवस्था, जिसके कारण आवारा पशुओं और मवेशियों की पहुंच यहां बेहद आसान हो गई है. नगर पालिका के अधिकारियों की यह उदासीनता और आंखें मूंदने की नीति इस बात का प्रमाण है कि उन्हें जनता के स्वास्थ्य और पर्यावरण की कोई परवाह नहीं है. जब भी इस संबंध में स्थानीय लोगों द्वारा आवाज उठाई जाती है, तो केवल कागजी औपचारिकताएं पूरी करके मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है, जिससे स्थानीय निवासियों में प्रशासनिक व्यवस्था के खिलाफ भारी रोष व्याप्त है.
कचरे के ढेर में प्लास्टिक निगलते बेजुबान गोवंश और उनकी दर्दनाक दास्तान
इस डंपिंग यार्ड की सबसे दर्दनाक तस्वीर वहां भटकने वाले मवेशियों और गोवंश की है, जो भूख और लाचारी के कारण कचरे के ढेरों के बीच भोजन तलाशने आते हैं. रसोई के कचरे के साथ-साथ फेंकी गई प्लास्टिक की थैलियां, पन्नी और खतरनाक केमिकल युक्त सामग्रियां ये बेजुबान जानवर अनजाने में चबा जाते हैं. प्लास्टिक पचने योग्य नहीं होता है, जिसके कारण धीरे-धीरे यह गोवंश के पेट में एक ठोस चट्टान की तरह जमा हो जाता है और उनकी पाचन क्रिया पूरी तरह ठप हो जाती है. समय पर इलाज और सही देखभाल न मिलने के कारण कई मवेशी तड़प-तड़प कर दम तोड़ देते हैं, और उनके सड़ते हुए शव भी इसी कचरे के बीच लावारिस हालत में पड़े रहते हैं. गौ रक्षा और पशु कल्याण के बड़े-बड़े दावे करने वाले संगठनों और सरकारी तंत्र की खामोशी इन बेजुबानों की मौत पर सवालिया निशान खड़े करती है, क्योंकि कोई भी जिम्मेदार अधिकारी इस अमानवीय स्थिति की सुधि लेने को तैयार नहीं है.
जहरीले धुएं के आगोश में बस्तियां: सांस की गंभीर बीमारियों से जूझ रहे आम नागरिक
डंपिंग यार्ड में फेंके गए कचरे में अक्सर आग सुलगती रहती है या फिर जानबूझकर कचरे को ठिकाने लगाने के लिए उसमें आग लगा दी जाती है, जिससे उठने वाला जहरीला और दमघोटू धुआं आसपास के रिहायशी इलाकों में फैल जाता है. इस धुएं में प्लास्टिक और रबर के जलने से निकलने वाले खतरनाक dioxins और furan जैसे विषैले रसायन होते हैं, जो सीधे फेफड़ों पर वार करते हैं. स्थिति यह हो चुकी है कि रावतभाटा के इस क्षेत्र के आसपास रहने वाले बच्चे, बुजुर्ग और महिलाएं अस्थमा, दमा, आंखों में जलन, त्वचा संक्रमण और गंभीर सांस की बीमारियों की चपेट में तेजी से आ रहे हैं. सुबह और शाम के समय हवा की गुणवत्ता इतनी गिर जाती है कि घरों की खिड़कियां और दरवाजे बंद रखना मजबूरी बन जाता है, लेकिन इसके बावजूद दीवारों से रिसकर यह जहरीली हवा घरों के भीतर तक पहुंच जाती है. स्थानीय नागरिकों का जीना मुहाल हो चुका है और वे हर सांस के साथ जहर निगलने को विवश हैं.
पर्यावरण संतुलन और एनजीटी (NGT) के नियमों की खुलेआम उड़ रही धज्जियां
राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के स्पष्ट निर्देश हैं कि किसी भी शहर का कचरा खुले स्थानों पर डंप नहीं किया जाएगा और न ही वहां कचरे में आग लगाई जाएगी, ताकि भूजल और वायुमंडल को दूषित होने से बचाया जा सके. इसके बावजूद रावतभाटा के इस डंपिंग यार्ड में नियमों की सरेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं. बारिश के दिनों में इस कचरे से रिसने वाला जहरीला पानी (लीचेट) जमीन में रिसकर भूजल को भी पूरी तरह दूषित कर रहा है, जिसे आसपास के बोरवेल के जरिए लोग पीने के लिए मजबूर हैं. यदि समय रहते इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया, तो यह क्षेत्र एक बड़े स्वास्थ्य और पर्यावरणीय संकट का केंद्र बन जाएगा, जिससे उबरना प्रशासन के लिए भी असंभव होगा.
जनता की सुलगती मांग और प्रशासनिक जवाबदेही का अभाव
क्षेत्रीय जनता और विभिन्न सामाजिक संगठनों ने अब इस मुद्दे को लेकर आर-पार की लड़ाई लड़ने का मन बना लिया है. लोगों की मांग है कि इस अवैध और असुरक्षित डंपिंग यार्ड को तुरंत शहर से दूर स्थानांतरित किया जाए, कचरे के वैज्ञानिक प्रबंधन (Waste Management) के लिए ठोस प्लांट स्थापित किया जाए, और गोवंश की सुरक्षा के लिए कड़े इंतजाम किए जाएं. साथ ही, इस पूरी लापरवाही के लिए जिम्मेदार दोषी अधिकारियों और ठेकेदारों के खिलाफ सख्त प्रशासनिक कार्रवाई की जानी चाहिए ताकि भविष्य में कोई भी जनस्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ करने की हिम्मत न जुटा सके.