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भारत-चीन के बीच युद्ध हुआ तो अमेरिका की बड़ी भूमिका होगी: डा. चंद

नैनीताल। चीन एवं भारत के बीच इन दिनों चल रही तनातनी दोनों देशों के बीच युद्ध तक नहीं जाएगी, क्योंकि दोनों देश युद्ध नहीं चाहते। हमेशा से विस्तारवादी नीति पर चलने वाला चीन जो कुछ कर रहा है, वह दुनिया भर में उसके प्रति कोरोना की वजह से फैली नकारात्मकता से ध्यान हटाने के कारण कर रहा है। इसके बावजूद अगर भारत एवं चीन के बीच किसी छोटे युद्ध जैसे हालात बनते भी हैं तो इसमें अमेरिका की बड़ी भूमिका होगी। यह बात कुमाऊं विश्वविद्यालय के राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय बलुवाकोट में रक्षा अध्ययन विभाग के विभागाध्यक्ष डा. अतुल चंद ने कही है।

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रक्षा विषयों पर 32 शोध पत्र एवं तीन पुस्तकें प्रकाशित कर चुके राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय बलुवाकोट के कार्यकारी प्राचार्य भी रहे डा. चंद ने ‘हिन्दुस्थान समाचार’ से विशेष बातचीत में यह बात कही। उन्होंने कहा कि चीन जहां रूस के विघटन के बाद स्वयं को उसके स्थान पर दूसरी महाशक्ति के रूप में प्रतिस्थापित होने की कोशिश कर रहा है, वहीं अमेरिका उसका प्रभाव समाप्त करना चाहता है। वह चीन से आये कोरोना का सबसे बड़ा भुक्तभोगी होने की वजह से भी चीन के खिलाफ कोई कार्रवाई करने का मौका तलाश रहा है। ऐसे में वह कोरोना का प्रकोप शांत होने के बाद अमेरिका ताइवान, हांगकांग को लेकर भी चीन के विरुद्ध अफगानिस्तान, ईरान आदि की तरह छोटी कार्रवाई कर सकता है।

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डा. चंद ने कहा कि चीन की सीमा 14 देशों से जुड़ती है, और विस्तारवादी-साम्राज्यवादी मानसिकता वाले चीन की भारत, ताइवान, हांगकांग व जापान सहित कमोबेश सभी देशों से सीमा विवाद है। वह हर ओर अपनी सीमा से आगे दूसरे देशों में बढ़ता रहता है और फिर समझौता होने पर कुछ पीछे आ जाता है। इसके बावजूद वह अपनी सीमा से कुछ आगे बढ़ चुका होता हैं। यह उसकी नीति में शामिल है। फिलहाल आर्थिक कारणों से चीन व भारत के बीच युद्ध की आशंका से इनकार करने के साथ ही उन्होंने कहा कि यदि कोई छोटा युद्ध होता भी है तो चीन हर दृष्टि से भारत के सामने कमजोर साबित होगा।

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उन्होंने कहा कि भारत के पास विश्व की सर्वश्रेष्ठ ऊंचाई पर लड़ने वाली सेना है जबकि चीन की सीमा को वहां लड़ने का कोई अनुभव नहीं है। हथियारों के मोर्चे पर भी भारत के ब्रह्मोस की कोई काट चीन के पास नहीं है। साथ ही भारत ने 1998 में एक किलोवाट से कम क्षमता के परमाणु बम चलाने की खासकर छोटे युद्ध नीति के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण तकनीक भी है, जो विश्व में कुछ ही देशों के पास है। उधर, अमेरिका विश्व की 18 फीसद जनसंख्या के स्वामी भारत के एकमुश्त बड़े बाजार एवं हथियारों के बड़े आयातक के रूप में उपयोगी होने के दृष्टिगत भारत के करीब है। इसलिए वह भारत-चीन के बीच युद्ध की स्थिति में भारत के साथ होगा।

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डा. चंद ने बताया कि 1914 से 1933 के नक्शे में पूरा लद्दाख भारत के नक्शे में शामिल था किंतु माओत्से तुंग के आने के बाद 1957 से चीन ने इस क्षेत्र को अपने क्षेत्र में दिखाना प्रारंभ किया। भारत ने इसका विरोध भी नहीं किया। उन्होंने बताया कि 1959 में लद्दाख में भारत व चीन के बीच पहली भिड़ंत हुई थी जबकि 1962 में चीन ने लद्दाख के क्षेत्र पर अपना कब्जा कर लिया था।

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