लखनऊ में गोमती नदी की भीषण बाढ़ का कहर, शहर के 40 हजार घरों में घुसा बाढ़ का पानी
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ (Lucknow) इन दिनों एक भीषण और भयावह प्राकृतिक आपदा के दौर से गुजर रही है, जहां से लगातार दिल दहला देने वाली तस्वीरें और वीडियो सामने आ रहे हैं. शहर की जीवनदायिनी मानी जाने वाली गोमती नदी (Gomti River) का जलस्तर पिछले कुछ दिनों से लगातार खतरे के निशान से ऊपर बह रहा है, जिसके कारण नदी अपने विकराल रूप में शहर के रिहायशी इलाकों में तांडव मचा रही है. जिला प्रशासन और आपदा प्रबंधन की तमाम कोशिशों के बावजूद गोमती का उफनता हुआ पानी लखनऊ के निचले और तटीय इलाकों में बने लगभग 40 हजार से अधिक घरों के अंदर तक घुस चुका है, जिससे आम जनजीवन पूरी तरह से अस्त-व्यस्त हो गया है. स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि शहर के कई प्रमुख कॉलोनियों, बस्तियों और आशियानों को छोड़कर अब तक 10 हजार से ज्यादा लोगों को अपना घर-बार छोड़कर सुरक्षित स्थानों, टेंटों और राहत शिविरों में पलायन करने के लिए मजबूर होना पड़ा है. सोशल मीडिया पर वायरल हो रही इन भयावह तस्वीरों को देखकर हर कोई सहम उठा है, क्योंकि पानी का यह सैलाब अपने साथ लोगों की गृहस्थी का सारा सामान और वर्षों की मेहनत बहाकर ले जा रहा है.
गोमती नदी के उफान से लखनऊ के इन इलाकों में मचा हाहाकार
लखनऊ के स्थानीय निवासियों के लिए गोमती नदी का यह भयंकर रूप पिछले कई दशकों में सबसे डरावना माना जा रहा है. लगातार हो रही बारिश और ऊपरी बांधों से छोड़े गए पानी के चलते गोमती नदी का जलस्तर इतनी तेजी से बढ़ा कि तटबंध और सुरक्षा दीवारें भी पानी के दबाव को रोक नहीं पाईं. निशातगंज, गोमती नगर विस्तार के निचले हिस्से, समता मूलक चौक के आसपास की बस्तियों, फैजाबाद रोड से सटे इलाकों और झूलेलाल पार्क के सामने वाले क्षेत्रों में पानी ने तबाही मचा रखी है. लोग अपने घरों की छतों पर शरण लेने को विवश हैं या फिर प्रशासन द्वारा भेजी गई नावों के जरिए किसी तरह बाहर निकल रहे हैं. घरों के भूतल (Ground Floor) पूरी तरह से जलमग्न हो चुके हैं, जहां फ्रिज, टीवी, सोफे और खाने-पीने का राशन सब कुछ पानी में तैरता हुआ नजर आ रहा है. बिजली और पानी की आपूर्ति बाधित होने के कारण इन इलाकों में नरक जैसे हालात बन गए हैं, जहां लोगों को पीने के साफ पानी के लिए भी संघर्ष करना पड़ रहा है.
40 हजार घरों में घुसा पानी: कैसे बबार्द हो गई लोगों की बरसों की जमा-पूंजी?
जब किसी शहर के शहरी इलाकों में नदी का पानी इस तरह घुस जाता है, तो नुकसान का आकलन करना बेहद कठिन हो जाता है. लखनऊ के प्रभावित इलाकों में लगभग 40 हजार घरों के भीतर पानी भर जाने से लोगों की गृहस्थी का सामान पूरी तरह से बर्बाद हो गया है. गरीब और मध्यम वर्ग के वे परिवार जिन्होंने तिनका-तिनका जोड़कर अपना आशियाना बनाया था, वे आज अपनी आंखों के सामने अपनी पूरी दुनिया को पानी में डूबते हुए देखने को विवश हैं. बच्चों की स्कूल की किताबें, जरूरी दस्तावेज, कपड़े और राशन का सामान सब कुछ गीला होकर खराब हो चुका है. स्थानीय लोगों का कहना है कि प्रशासन की तरफ से समय रहते पानी के बहाव को नियंत्रित करने या पुख्ता इंतजाम करने में जो देरी हुई, उसका खामियाजा आज आम जनता को भुगतना पड़ रहा है. घरों के अंदर जहरीले कीड़े, सांप और बिच्छू घुसने का खतरा भी लगातार बना हुआ है, जिससे लोगों की चिंताएं और अधिक बढ़ गई हैं.
10 हजार से अधिक लोगों का पलायन और प्रशासन द्वारा चलाए जा रहे राहत शिविर
इस भीषण आपदा के बीच सबसे बड़ी प्राथमिकता लोगों की जान बचाना है, जिसके चलते पिछले 48 घंटों के दौरान 10 हजार से अधिक नागरिकों को प्रभावित क्षेत्रों से रेस्क्यू करके सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया है. जिला प्रशासन, एनडीआरएफ (NDRF), एसडीआरएफ (SDRF) और प्रांतीय रक्षक दल की टीमें दिन-रात राहत और बचाव कार्यों में जुटी हुई हैं. शहर के विभिन्न स्कूलों, सामुदायिक केंद्रों और ऊंचे स्थानों पर अस्थायी राहत शिविर (Relief Camps) बनाए गए हैं, जहां बेघर हुए लोगों के लिए भोजन, पीने का पानी और मेडिकल कैंप की व्यवस्था की जा रही है. जिला प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों ने मौके का मुआयना करते हुए यह आश्वासन दिया है कि इस संकट की घड़ी में सरकार प्रभावित परिवारों के साथ पूरी मजबूती से खड़ी है और हरसंभव मदद पहुंचाई जा रही है, हालांकि जमीनी स्तर पर अभी भी कई जगहों पर लोग मदद का इंतजार कर रहे हैं.
पर्यावरण संतुलन और शहरी नियोजन पर खड़े होते गंभीर सवाल
लखनऊ में गोमती नदी की इस बाढ़ ने एक बार फिर हमारे शहरी विकास, ड्रेनेज सिस्टम और रिवरफ्रंट के मास्टर प्लान पर गंभीर सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं. प्रकृति के रास्ते में अवैध कब्जे, नदी के प्राकृतिक प्रवाह को रोकने वाले निर्माण और कंक्रीट के जंगलों ने पानी के निकास के रास्तों को पूरी तरह से बंद कर दिया है, जिसके कारण थोड़ी सी बारिश या पानी छूटने पर नदियां अपने रौद्र रूप में शहर को डुबो देती हैं. पर्यावरणविदों का यह मानना है कि यदि अब भी हमने गोमती के प्राकृतिक कैचमेंट एरिया और वेटलैंड्स को बचाने के लिए कड़े कदम नहीं उठाए, तो भविष्य में लखनऊ को और भी बड़े खतरों का सामना करना पड़ सकता है. यह समय केवल राहत बांटने का नहीं, बल्कि भविष्य के लिए एक स्थायी जल निकासी और बाढ़ नियंत्रण नीति बनाने का है.