अमेरिका ने ही बनाया चीन को 'सुपरपावर'; अब भारी कर्ज के बीच ट्रंप को क्यों बदलना पड़ा अपना रुख, समझें पूरी इनसाइड स्टोरी

अमेरिका ने ही बनाया चीन को 'सुपरपावर'; अब भारी कर्ज के बीच ट्रंप को क्यों बदलना पड़ा अपना रुख, समझें पूरी इनसाइड स्टोरी

मौजूदा समय में अमेरिका के बाद चीन दुनिया का सबसे ताकतवर और प्रभावशाली देश बन चुका है। जहां अमेरिकी अर्थव्यवस्था करीब 30 ट्रिलियन डॉलर के आंकड़े पर है, वहीं चीन भी 20 ट्रिलियन डॉलर के साथ मजबूती से खड़ा है। बीते 30 सालों में बीजिंग ने ग्लोबल सप्लाई चेन पर ऐसा दबदबा बनाया है कि आज दुनिया के तमाम देश छोटी से छोटी चीज से लेकर 'रेयर अर्थ मिनरल्स' तक के लिए उस पर निर्भर हैं। हैरानी की बात यह है कि अमेरिका का राष्ट्रीय ध्वज हो या मशहूर 'डाइट कोक' में इस्तेमाल होने वाले खास तत्व, यह सब चीन से ही बनकर आता है। यूरोप और अमेरिका के बाजारों में बिकने वाले कपड़े, खिलौने और बेडिंग आइटम का भी मुख्य सप्लायर चीन ही है।

चीन की तरक्की के पीछे अमेरिका का ही हाथ

चीन की इस बेतहाशा तरक्की में वहां के नेतृत्व और जनता की मेहनत तो है ही, लेकिन अमेरिका ने ही अनजाने में इसके लिए सबसे बड़ा रास्ता तैयार किया था। बिल क्लिंटन के दौर में अमेरिका ने "रचनात्मक आर्थिक जुड़ाव" की नीति अपनाई थी। इसके तहत चीन को वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गनाइजेशन (WTO) में एंट्री मिली। अमेरिका की सोच थी कि व्यापारिक रिश्ते मजबूत होने से दोनों देशों के बीच राजनीतिक मतभेद कम हो जाएंगे। लेकिन दांव उल्टा पड़ गया और जिस चीन को अमेरिका ने अपने हाथों से बड़ा किया, आज वही उसके लिए सबसे बड़ा सिरदर्द बन चुका है।

रेयर अर्थ मिनरल्स ने बांधे अमेरिका के हाथ

हाल ही में अमेरिकी कांग्रेस ने रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 100% टैरिफ लगाने का बिल पास किया है, जिस पर राष्ट्रपति ने भी मुहर लगा दी है। इसका सीधा निशाना चीन था, लेकिन हकीकत में ड्रैगन पर भारी टैरिफ लगाना अमेरिका के बस की बात नहीं है। इससे पहले डोनाल्ड ट्रंप ने भी चीन पर कड़े टैरिफ लगाने की कोशिश की थी, लेकिन उन्हें जल्द ही कदम पीछे खींचने पड़े। इसका सबसे बड़ा कारण 'रेयर अर्थ मिनरल्स' हैं। मोबाइल फोन से लेकर मिसाइल और बैटरी बनाने तक में इन खनिजों का इस्तेमाल होता है और चीन इसका दुनिया में सबसे बड़ा सप्लायर है। अगर चीन ने सप्लाई रोकी, तो अमेरिकी इंडस्ट्री पूरी तरह ठप हो सकती है।

चुनाव और भारी कर्ज के कारण बदला ट्रंप का रुख

अमेरिका में नवंबर में चुनाव होने वाले हैं, जो मौजूदा प्रशासन के कामकाज का सीधा टेस्ट होंगे। ट्रंप ने दावा किया था कि वह 24 घंटे में रूस-यूक्रेन युद्ध रुकवा देंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उलटा रूस और ईरान जैसे देशों को चीन का खुला आर्थिक समर्थन मिल रहा है। दूसरी तरफ अमेरिका खुद गंभीर आर्थिक संकट में है। देश की जीडीपी 30 ट्रिलियन डॉलर है, लेकिन कर्ज 38 ट्रिलियन डॉलर को पार कर चुका है। महंगाई और बढ़ती ब्याज दरों के कारण अमेरिकी अर्थव्यवस्था दबाव में है। ऐसे में चीन से सीधा टकराव मोल लेने के बजाय उसके साथ बातचीत का रास्ता निकालना अमेरिका की मजबूरी बन गया है।

शी जिनपिंग का अमेरिकी दौरा और ताइवान पर चेतावनी

करीब 10 साल बाद शी जिनपिंग के अमेरिकी दौरे ने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा है। डोनाल्ड ट्रंप ने सारे प्रोटोकॉल तोड़कर खुद एयरपोर्ट पर उनका स्वागत किया, जो यह दिखाता है कि अमेरिका थोड़ा दबाव में है। हालांकि, तीन दिन की इस हाई-प्रोफाइल मुलाकात में कोई बड़ा व्यापारिक समझौता नहीं हुआ, लेकिन दोनों देश ट्रेड वॉर को कुछ समय के लिए टालने पर सहमत हुए। कृषि, ऊर्जा और AI जैसे मुद्दों पर बात जरूर हुई। वहीं, ताइवान के मुद्दे पर शी जिनपिंग ने अमेरिका को साफ चेतावनी दे दी है कि वह इस मामले में सावधानी से कदम रखे।

चीन के सामने भारत है अमेरिका का सबसे बड़ा हथियार

साल 2001 में जॉर्ज डब्ल्यू बुश के कार्यकाल से ही अमेरिका ने चीन को काउंटर करने के लिए भारत को एक मजबूत विकल्प के तौर पर तैयार करना शुरू कर दिया था। रिपब्लिकन हो या डेमोक्रेटिक, दोनों ही पार्टियों ने एशिया में अपने रणनीतिक और आर्थिक हितों को सुरक्षित रखने के लिए भारत के साथ रिश्ते मजबूत किए हैं। अमेरिका का साफ मानना है कि चीन की चुनौतियों का सामना करने के लिए भारत को ताकतवर बनाना जरूरी है। हालांकि, डोनाल्ड ट्रंप के मौजूदा नजरिए में चीन को लेकर अब एक नई और बदली हुई रणनीति साफ तौर पर दिखाई दे रही है।